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हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955

(amended till 2018)

धाराओं का क्रम

अध्याय 1

प्रारम्भिक

धाराएं                                                                                                      

  1. संक्षिप्त नाम और विस्तार
  2. अधिनियम को लागू होना
  3. परिभाषाएँ
  4. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव

अध्याय 2

हिन्दू विवाह

  1. हिन्दू विवाह के लिए शर्ते
  2. विवाह में अभिभावकता (निरसित)
  3. हिन्दू विवाह के लिये कर्मकांड
  4. हिन्दू विवाहों का रजिस्ट्रीकरण

अध्याय 3

दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन और न्यायिक पृथक्करण

  1. दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन
  2. न्यायिक पृथक्करण

अध्याय 4

विवाह की अकृतता और विवाह-विच्छेद

  1. शून्य विवाह
  2. शून्यकैरणीय विवाह
  3. विवाह-विच्छेद

13-क. विवाह-विच्छेद की कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी को वैकल्पिक अनुतोष

13-ख. पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद

  1. विवाह से एक वर्ष के भीतर विवाह-विच्छेद के लिए कोई अर्जी उपस्थापित न की जाएगी
  2. कब विवाह-विच्छेद प्राप्त व्यक्ति पुनः विवाह कर सकेगा
  3. शून्य और शून्यकरणीय विवाहों के अपत्यों की धर्मजता
  4. द्विविवाह के लिये दण्ड
  5. हिन्दू विवाह की कतिपय अन्य शर्तो के उल्लंघन के लिए दंड

 

अध्याय 5

क्षेत्राधिकार और प्रक्रिया

  1. वह न्यायालय जिसमें अर्जी उपस्थापित की जायगी
  2. अर्जियों की अन्तर्वस्तु और सत्यापन
  3. 1908 के अधिनियम संख्यांक 5 का लागू होना

21-क. कुछ मामलों में अर्जियों को अन्तरित करने की शक्ति

21-ख. इस अधिनियम के अधीन अर्जियों के विचारण और निपटारे से सम्बन्धित विशेष उपबन्ध

21-ग. दस्तावेजी साक्ष्य

  1. कार्यवाहियों को बन्द कमरे में होना उन्हें मुद्रित या प्रकाशित न किया जाना
  2. कार्यवाहियों में डिक्री

23-क. विवाह-विच्छेद या अन्य कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी को अनुतोष

  1. वाद लम्बित रहते भरण-पोषण और कार्यवाहियों के व्यय
  2. स्थायी निर्वाहिका और भरण-पोषण
  3. अपत्यों की अभिरक्षा
  4. सम्पत्ति का व्ययन
  5. डिक्रियों और आदेशों की अपीलें

28-क. ड्रिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन

अध्याय 6

व्यावृत्तियाँ और निरसन

  1. व्यावृत्तियाँ
  2. निरसन
हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955

 (amended till 2018)

हिन्दुओं में विवाह सम्बन्धी विधि को संशोधित और संहिताबद्ध करने के लिये अधिनियम

भारत गणराज्य के छठे वर्ष में संसद द्वारा निम्नरूपेण अधिनियमित हो–

अध्याय 1

प्रारम्भिक

  1. संक्षिप्त नाम और विस्तार–(1) यह अधिनियम हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 कहा जा सकेगा ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है और यह उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, अधिवसित उन हिन्दुओं को भी लागू है जो उक्त राज्यक्षेत्रों के बाहर हों ।

 

टिप्पणी

सोन्दुर गोपाल बनाम सोन्दुर रजिनी, ए० आई० आर० 2013 सुप्रीम कोर्ट 2678-हिन्दू विवाह अधिनियम की राज्यक्षेत्रातीत प्रयोज्यता है और भारत में या विदेश में रहने वाले सभी हिन्दुओं पर लागू होता है, बशर्ते वे भारत के अधिवासी हों ।

 

  1. अधिनियम का लागू होना (1) यह अधिनियम लागू है—

(क)  ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो हिन्दू धर्म के किसी भी रूप या विकास के अनुसार, जिसके । | अन्तर्गत     वीरशैव, लिंगायत अथवा ब्रह्मसमाज, प्रार्थनासमाज या आर्यसमाज के अनुयायी भी आते

हैं, धर्मतः हिन्दू हो ;

(ख)  ऐसे किसी भी व्यक्ति को जो धर्मतः जैन, बौद्ध या सिक्ख हो ; तथा

(ग)   ऐसे किसी भी अन्य व्यक्ति जो   उन राज्यक्षेत्रों में, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है,

अधिवसित हो और धर्मत: मुस्लिम, क्रिश्चियन, पारसी या यहूदी न हो, जब तक कि यह , साबित न कर दिया जाये कि यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो ऐसा कोई भी व्यक्ति एतस्मिन् उपबन्धित किसी भी बात के बारे में हिन्दू विधि या उस विधि के भाग रूप किसी रूढ़ि या प्रथा द्वारा शासित न होता ।

स्पष्टीकरण- निम्नलिखित व्यक्ति धर्मतः, यथास्थिति, हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख है —

(क)   कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता दोनों ही धर्मतः हिन्दू, बौद्ध, जैन या

सिक्ख हों ;

(ख)  कोई भी अपत्य, धर्मज या अधर्मज, जिसके माता-पिता में से कोई एक धर्मतः हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख हो और जो उस जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुंब के सदस्य के रूप में पला हो जिसका वह माता या पिता सदस्य है या था ; तथा

1 राष्ट्रपति द्वारा 18 मई, 1955 को स्वीकृत तथा दिनांक 18 मई, 1955 को भारतीय राजपत्र, असाधारण भाग 3, धारा 1 में प्रकाशित।

 

  (ग)  कोई भी ऐसा व्यक्ति जो हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिक्ख धर्म में संपरिवर्तित या प्रतिसंपरिवर्तित हो | गया   हो। |

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुये भी इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसी जनजाति के सदस्यों को जो संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (25) के अर्थ के अंतर्गत अनूसूचित जनजाति हो, लागू न होगी जब तक कि केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अन्यथा निर्दिष्ट न कर दे ।

(3) इस अधिनियम के किसी भी प्रभाग में आये हुये ”हिन्दू” पद का ऐसा अर्थ लगाया जायेगा मानो उसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति आता हो जो, यद्यपि धर्मतः हिन्दू नहीं है तथापि ऐसा व्यक्ति है जिसे यह अधिनियम इस धारा के अंतर्विष्ट उपबंधों के आधार पर लागू होता है ।

टिप्पणी

के० एम० मनु बनाम चेयरमैन स्क्रुटिनी कमिटी फॉर वेरीफिकेशन ऑफ कम्यूनिटी सर्टिफिकेट, ए० आई० आर० 2015 सु० को० 1402-यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता हिन्दू धर्म त्याग कर इसाई धर्म स्वीकार कर लेते हैं और वह व्यक्ति माता-पिता के द्वारा इसाई धर्म में संपरिवर्तन के बाद उत्पन्न होता है और हिन्दू धर्म को अंगीकार कर लेता है तथा उस जाति के सदस्य जिसमें वह संपरिवर्तित होता है उसे स्वीकार कर लेते हैं तो ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति उस जाति का सदस्य हो जाता है ।

यह अधिनियम ‘हिन्दुओं पर लागू होता है। बालक चाहे वह औरस हो या जारज, यदि उसके मातापिता हिन्दू हैं तो वह हिन्दू माना जायेगा। यदि उसकी माता ही हिन्दू है और पिता मुसलमान है तो यह अधिनियम ऐसे बालक पर तब तक लागू नहीं होगा, जब तक यह साबित नहीं कर दिया जाता कि उस बालक का लालन-पालन हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार किया गया है। (कृष्णा कुमारी बनाम पैलेस एडमिनिस्ट्रेशन बोर्ड कालिकोटा, ए० आई० आर० 2009 केरल 122) ।

वे लोग हिन्दू हैं जो अपने-आपको हिन्दू कहते हैं तथा हिन्दू धर्म एवं संस्कृति के अनुसार आचरण करते हैं। (यज्ञ पुरुषदासजी बनाम मूलदास, ए० आई० आर० 1966 एस० सी० 1119)

 

  1. परिभाषाएं– इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,

(क)   रूढ़ि” और ”प्रथा”, पद ऐसे किसी भी नियम का संज्ञान कराते हैं जिसने दीर्घकाल तक निरंतर | और एकरूपता से अनुपालित किये जाने के कारण किसी स्थानीय क्षेत्र, जनजाति, समुदाय, समूह या कुटुंब के हिन्दुओं में विधि का बल अभिप्राप्त कर लिया हो —

परंतु यह तब जब कि वह नियम निश्चित हो और अयुक्तियुक्त या लोकनीति के विरुद्ध न हो; तथा ।

परंतु यह और भी कि ऐसे नियम की दशा में जो एक कुटुंब को ही लागू हो, उसकी निरंतरता उस   कुटुंब द्वारा बंद न कर दी गई हो ;

(ख)   “जिला न्यायालय” से अभिप्रेत है ऐसे किसी क्षेत्र में, जिसके लिये कोई नगर सिविल न्यायालय

हो, वह न्यायालय और अन्य किसी क्षेत्र में आरंभिक अधिकारिता का प्रधान सिविल न्यायालय तथा इसके अंतर्गत ऐसा कोई भी अन्य सिविल न्यायालय आता है जिसे राज्य सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम में व्यवहृत बातों के बारे में अधिकारितायुक्त विनिर्दिष्ट कर दे ;

(ग)   पूर्ण रक्त” और ”अर्ध रक्त”-कोई भी दो व्यक्ति एक दूसरे से पूर्ण रक्त से संबंधित तब कहे जाते हैं जब कि वे एक ही पूर्वज से एक ही पत्नी द्वारा अवजनित हों और अर्ध रक्त से तब जब कि वह एक ही पूर्वज से किन्तु भिन्न पत्नियों द्वारा अवजनित हों ;

(घ)    “एकोदर रक्त”- दो व्यक्ति एक से एकोदर रक्त से संबंधित तब कहे जाते हैं जब कि वे एक ही पूर्वजा से किन्तु भिन्न पतियों द्वारा अवजनित हों ;

स्पष्टीकरण-खंड (ग) और (घ) में ”पूर्वज” के अंतर्गत पिता और पूर्वजा” के अंतर्गत माता आती है ।

(ङ)    “विहित” से अभिप्रेत है इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित ;

(च)   (i)  “सपिंड नातेदारी”, जब निर्देश किसी व्यक्ति के प्रति हो तो, माता के माध्यम से उसकी ऊपरली ओर की परंपरा में तीसरी पीढ़ी तक (जिसके अंतर्गत तीसरी पीढ़ी भी आती है) और पिता के माध्यम से उसकी ऊपरली ओर की परंपरा में पांचवीं पीढ़ी तक (जिसके अंतर्गत पांचवीं पीढ़ी भी आती है) जाती है, हर एक दशा में वंश परंपरा सम्पृक्त व्यक्ति से, जिसे पहली पीढ़ी का गिना जायेगा, ऊपर की ओर चलेगी ;

(ii)    दो व्यक्ति एक दूसरे के सपिंड” तब कहे जाते हैं जबकि या तो एक उनमें से दूसरे का सपिंड नातेदारी की सीमाओं के भीतर पूर्वपुरुष हो या जबकि उनका ऐसा कोई एक ही पारंपरिक पूर्व पुरुष हो, जो, निर्देश उनमें से जिस किसी के भी प्रति हो, उससे सपिंड नातेदारी की सीमाओं के भीतर हो ;

(छ)   ‘प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्रियां”-दो व्यक्ति प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्रियों के भीतर कहे जाते है —

(i)  यदि एक उनमें से दूसरे का पारंपरिक पूर्वपुरुष हो ; या

(ii) यदि एक उनमें से दूसरे के पारंपरिक पूर्वपुरुष या वंशज की पत्नी या पति रहा हो ; या

(iii) यदि एक उनमें से दूसरे के भाई की या पिता अथवा माता के भाई की, या पितामह अथवा  पितामही के भाई की या मातामह अथवा मातामही के भाई की पत्नी रही हो; या

(iv) यदि वे भाई और बहिन, ताया, चाचा और भतीजी, मामा और भांजी, फूफी और भतीजा, मौसी और भांजा या भाई-बहिन के अपत्य, भाई-भाई के अपत्य अथवा बहिन-बहिन के अपत्य हों ;

स्पष्टीकरण-खंड (च) और (छ) के प्रयोजनों के लिये ”नातेदारी” के अंतर्गत आती हैं—

(i) पूर्ण रक्त की नातेदारी, तथैव अर्ध या एकोदर रक्त की नातेदारी ;

(ii) धर्मज रक्त की नातेदारी, तथैव अधर्मज रक्त की नातेदारी;

(iii) रक्तजन्य नातेदारी, तथैव दत्तक, नातेदारी;

और उन खंडों में नातेदारी संबंधी सभी पदों का   अर्थ तदनुसार लगाया जायेगा ।

टिप्पणी

लक्ष्मीबाई बनाम भगवन्त बुआ, ए० आई० आर० 2013 सुप्रीम कोर्ट 1204- प्रथा सामान्य वैयक्तिक विधि को संशोधित करने का प्रभाव रखती है, परन्तु यह अधिनियमित विधि पर अधिभावी नहीं होती है, जब तक कि प्रथा को अभिव्यक्त रूप से इसके द्वारा आरक्षित न कर दिया गया हो। | लक्ष्मीबाई बनाम भगवन्त बुआ, ए० आई० आर० 2013 सुप्रीम कोर्ट 1204- प्रथा को स्पष्ट एवं असंदिग्ध साक्ष्य द्वारा प्रमाणित किया जाना चाहिए। इसे सादृश्यता अथवा तार्किक प्रक्रिया के द्वारा विकसित नहीं किया जा सकता ।

  1. अधिनियम को अध्यारोही प्रभाव– इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय’

(क)  हिन्दू विधि का कोई ऐसा शास्त्रवाक्य, नियम या निर्वचन या उस विधि की भागरूप कोई भी रूढ़ि या प्रथा जो इस अधिनियम के प्रारंभ के अव्यवहित पूर्व प्रवृत्त रही हो ऐसे किसी भी विषय के बारे में, जिसके लिये इस अधिनियम में उपबन्ध किया गया है, प्रभावहीन हो जायेगी ;

(ख) इस अधिनियम के प्रारंभ के अव्यवहित पूर्व प्रवृत्त कोई भी अन्य विधि, वहां तक प्रभावहीन हो जायेगी जहां तक कि वह इस अधिनियम में अंतर्विष्ट उपबंधों में से किसी से भी असंगत हो ।

अध्याय 2

हिन्दू विवाह

  1. हिन्दू विवाह के लिये शर्ते— दो हिन्दुओं के बीच विवाह अनुष्ठापित किया जा सकेगा यदि निम्नलिखित शर्ते पूरी हो जायं, अर्थात् –

(i)    विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से, न तो वर की कोई जीवित पत्नी हो और न वधू का कोई जीवित पति हो ;

(ii) विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से कोई पक्षकार–

(क) चित्त-विकृति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हो ;

(ख) ‘ विधिमान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी इस प्रकार के या इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित न रहा हो कि वह विवाह और सन्तानोत्पत्ति के लिये अयोग्य हो; या

(ग) उसे उन्मत्तता  2[x Xx] का बार-बार दौरा न पड़ता हो ;

(iii) विवाह के समय वर ने 3[इक्कीस वर्ष] की आयु और वधू ने 3[अठारह वर्ष] की आयु पूरी कर ली हो ;

(iv) जब तक कि दोनों पक्षकारों में से हर एक को शासित करने वाली रूढि या प्रथा से उन दोनों के बीच विवाह अनुज्ञात न हो, वे प्रतिषिद्ध नातेदारी डिग्रियों के भीतर न हों ; | जब तक कि दोनों पक्षकारों में से हर एक को शासित करने वाली रूढ़ि या प्रथा से उन दोनों के बीच विवाह अनुज्ञात न हो, वे एक दूसरे के सपिण्ड न हों ;

(vi) 4[x x x ]

 

  1. खण्ड (ii) विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा प्रतिस्थापित।
  2. शब्द ‘या मिरगी” 1999 के अधिनियम संख्या 39 द्वारा विलोपित।।
  3. 1978 के अधिनियम संख्या 2 द्वारा ”अट्ठारह वर्ष और पन्द्रह वर्ष” के स्थान पर क्रमशः ‘‘इक्कीस वर्ष और अट्ठारह वर्ष’ प्रतिस्थापित।
  4. 1978 के अधिनियम संख्या 2 द्वारा खण्ड (vi) विलोपित ।

टिप्पणी

हिन्दू विवाह की शर्ते एवं उल्लंघन का परिणाम—

शर्ते                                                                                 उल्लंघन हेतु दण्ड सम्बन्धित धाराएं

(1) एक विवाह                                                                          धारा 11 एवं 17

(2) मानसिक रूप से अस्वस्थ न होना                                      धारा 12 (1) (ख)

(3) आयु                                                                                  धारा 18 (क)

(4) प्रतिषिद्ध नातेदारी के अन्दर विवाह न होना                         धारा 18 (ख)

(5) पक्षकारों का सपिण्ड न होना                                              धारा 11 एवं 18 (ख)

 

सन्दर्भ :

(1) धारा 11-विवाह का शून्य होना ।

(2) धारा 17-द्विविवाह हेतु दण्ड ।

(3) धारा 12 (1) (ख)-विवाह को शून्यकरणीय घोषित करवाना ।

(4) धारा 18 (क)-दो वर्ष तक का कठोर कारावास या एक लाख रुपये तक का जुर्माना ; अथवा दोनों ।

(5) धारा 18 (ख)–एक मास तक का कारावास या एक हजार रुपये तक का जुर्माना ।

गुल्ली पिल्ली सावरिया राज बनाम बन्दा पवानी, ए० आई० आर० 2009 सुप्रीम कोर्ट 1085 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत किसी हिन्दू का किसी गैर हिन्दू के साथ किया गया विवाह शून्य होता है ।  

लता सिंह बनाम स्टेट ऑफ यू० पी०, ए० आई० आर० 2006 सुप्रीम कोर्ट 2522- हिन्दू विवाह नयम के अन्तर्गत अन्तर्जातीय विवाह वैध है चाहे यह अनुलोम विवाह हो या प्रतिलोम विवाह। अन्तर्जातीय विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम या अन्य किसी विधि के द्वारा प्रतिबन्धित नहीं है ।

अधिनियम के अन्तर्गत हिन्दू विवाह की वैधता के सम्बन्ध में समाज या पति-पत्नी के माता पिता द्वारा विवाह को मान्यता देना कोई पूर्व शर्त नहीं होती है। यदि धारा 5 में प्रतिपादित शर्ते पूरी होती हैं तो वह विवाह मान्य होता है। (वल्सम्मा पॉल बनाम कोचीन विश्वविद्यालय, ए० आई० आर० 1996 सुप्रीम कोर्ट 1011)

जहां पत्नी द्वारा दूसरा विवाह किया गया हो, लेकिन वह पहले विवाह को प्रथागत तलाक द्वारा विघटित हो जाना साबित नहीं कर पाई हो, वहाँ दूसरा विवाह धारा 5 (i) के अन्तर्गत शून्य माना जायेगा। (वीरेन्द्र कुमार गुलाबचन्द्र रुनवाल बनाम प्रीता वीरेन्द्र कुमार रुनवाल, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 1892 बम्बई)

केवल भूलने के स्वभाव को पागलपन या जड़ता नहीं कहा जा सकता। ऐसा विवाह अकृत एवं शून्य नहीं होता। (गिरीश डंगवाल बनाम सुपमा डंगवाल, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 1905 उत्तरांचल) |

  1. विवाह में अभिभावकता– [ बाल विवाह अवरोध (संशोधन) अधिनियम, 1978 (1978 का 2) की धारा 6 और अनुसूची द्वारा (1.10.1978 से) निरसित ।]

 

  1. हिन्दू विवाह के लिये कर्मकांड– (1) हिन्दू विवाह उसके पक्षकारों में से किसी को भी रूढ़िगत रीतियों और कर्मकांड के अनुसार अनुष्ठापित किया जा सकेगा ।

(2) जहां कि ऐसी रीतियों और कर्मकांड के अन्तर्गत सप्तपदी (अर्थात् अग्नि के समक्ष वर और वधू द्वारा संयुक्ततः सात पद चलना) आती हो वहां विवाह पूर्ण और आबद्धकर तब होता है जब सातवां पद चल लिया जाता है ।

टिप्पणी

विवाह के शास्त्रिक रीति से अनुष्ठित किए जाने के लिए निम्नलिखित कर्मकाण्ड आवश्यक है —

(1) कन्यादान और पाणिग्रहण,

(2) विवाह होम, और

(3) सप्तपदी

विवाह के कर्मकाण्डों के किये जाने का सबूत मान्य विवाह के लिए आवश्यक है। (शान्ता देव बनाम कंचन प्रभा देवी, ए० आई० आर० 1991 सुप्रीम कोर्ट 816)

जहाँ सप्तपदी आवश्यक हो, वहाँ सप्तपदी को पूरा किया जाना चाहिये। (भाऊराव बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र, ए० आई० आर० 1965 एस० सी० 1564) |

  1. हिन्दू विवाहों का रजिस्ट्रीकरण– (1) राज्य सरकार हिन्दू विवाहों का साबित किया जाना सुकर करने के प्रयोजन, से ऐसे नियम बना सकेगी जो यह उपबन्धित करे कि ऐसे किसी विवाह के पक्षकार अपने विवाह से सम्बद्ध विशिष्टियों की इस प्रयोजन के लिये रखे गये हिन्दू विवाह रजिस्टर में ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जैसी कि विहित की जाएं, प्रविष्टि करा सकेंगे ।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुये भी, यदि राज्य सरकार की यह राय हो कि ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह यह उपबन्ध कर सकेगी कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट विशिष्टियों का प्रविष्ट किया जाना उस राज्य में या उसके किसी भाग विशेष में, चाहे सभी दशाओं में, चाहे ऐसी दशाओं में, जो विनिर्दिष्ट की जाएं, वैवश्यक होगा और जहां कि कोई ऐसा निदेश निकाला गया हो, वहां इस निमित्त बनाये गये किसी नियम का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति जुर्माने से, जो कि पच्चीस रुपये तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

(3) इस धारा के अधीन बनाये गये सभी नियम बनाये जाने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान-मण्डल के समक्ष रखे जायेंगे। |

(4) हिन्दू विवाह रजिस्टर निरीक्षण के लिये सभी युक्तियुक्त समय पर खुला रहेगा और अपने में अन्तर्विष्ट कथनों के साक्ष्य के तौर पर ग्राह्य होगा तथा उसमें से प्रमाणित उद्धरण, आवेदन करने और रजिस्ट्रार को विहित फीस का संदाय करने पर, उसके द्वारा दिए जाएंगे ।

(5) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसी प्रविष्टि करने में हुआ लोप किसी हिन्दू विवाह की विधिमान्यता पर प्रभाव न डालेगा ।

टिप्पणी

हिन्दू विवाह के रजिस्ट्रीकरण को अनिवार्य बनाया जाना चाहिये। (सीमा बनाम अश्विनी कुमार, ए० आई० आर० 2006 एस० सी० 1158)

 

अध्याय 3

दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन और न्यायिक पृथक्करण

  1. दाम्पत्य अधिकारों को प्रत्यास्थापन जब कि पति या पत्नी ने अपने को दूसरे के साहचर्य से किसी युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना प्रत्याहृत कर लिया हो तब व्यथित पक्षकार दाम्पत्य अधिकारों के थापन के लिये जिला न्यायालय में अर्जी द्वारा आवेदन कर सकेगा और न्यायालय ऐसी अर्जी में किये गये कथनों के सत्य के बारे में तथा इस बात के बारे में कि इसके लिये कोई वैध आधार नहीं है कि आवेदन मंजूर क्यों न कर लिया जाये अपना समाधान हो जाने पर दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन डिक्री कर सकेगा ।

‘[ स्पष्टीकरण-जहां यह प्रश्न उठता है कि क्या साहचर्य के प्रत्याहरण के लिये युक्तियुक्त प्रतिहेतु है, वहां युक्तियुक्त प्रतिहेतु साबित करने का भार उस व्यक्ति पर होगा जिसने साहचर्य से प्रत्याहरण किया है ।]

 

टिप्पणी

भारत में पति-पत्नी को एक दूसरे के साथ रहने का अधिकार किसी कानून की ही देन नहीं है बल्कि यह अधिकार विवाह जैसी अवधारणा में अन्तर्निहित है। यह नहीं कहा जा सकता है कि अधिनियम की धारा 9 संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 21 का उल्लंघन करती है। (सरोजरानी बनाम सुदर्शन कुमार, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1962)

बचाव- दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के मामले में विरोधी पक्षकार को निम्नलिखित बचाव प्राप्त हो सकते हैं — (1) कि प्रत्यर्थी ने अपने को प्रार्थी के साहचर्य से नहीं हटाया है ।  (2) कि इस साहचर्य से हटने का युक्तियुक्त कारण है।  (3) कि प्रार्थी और प्रत्यर्थी के मध्य कोई मान्य विवाह अस्तित्व में है ही नहीं।  (4) कि प्रार्थी अपनी गलती या अयोग्यता का लाभ उठाना चाह रहा है।  (5) कि याचिका दायर करने में अनावश्यक या अनुचित विलम्ब हुआ है।  (6) कि याचिका प्रत्यर्थी के साथ साँठगाँठ करके पेश की गई है

 

  1. न्यायिक पृथक्करण– (1) विवाह का कोई पक्षकार, चाहे वह विवाह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् अनुष्ठापित हुआ हो, धारा 13 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी आधार पर और पत्नी की दशा में उक्त धारा की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी आधार पर भी, जिस पर विवाह-विच्छेद के लिये अर्जी पेश की जा सकती थी, न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिये प्रार्थना करते हुये अर्जी पेश कर सकेगा

(2) जहां कि न्यायिक पृथक्करण की डिक्री पारित हो गई हो, वहां अर्जीदार पर इस बात की बाध्यता न होगी कि वह प्रत्यर्थी के साथ सहवास करे, किन्तु दोनों पक्षकारों में से किसी के भी अर्जी द्वारा आवेदन करने पर तथा ऐसी अर्जी में किए गए कथनों की सत्यता के बारे में अपना समाधान हो जाने पर न्यायालय, यदि वह ऐसा करना न्यायसंगत और युक्तियुक्त समझे तो, डिक्री को विखण्डित कर सकेगा

टिप्पणी

कोई भी पक्षकार न्यायिक पृथक्करण की याचिका निम्नलिखित में से किसी भी आधार पर प्रस्तुत कर सकते हैं —(1) व्यभिचारिता का आचरण। (2) क्रूरता। (3) अभित्याग। (4) धर्मपरिवर्तन (5) विकृतचित्तता। (6) कोढ़ (7) संचारी रतिजन्य रोग (8) संन्यासी होना (9) सात वर्ष से लापता होना

निम्नलिखित आधार केवल पत्नी को प्राप्त है-[ धारा 13 (2)]

  • पति द्वारा दूसरा विवाह करने पर (2) पति के बलात्संग या अप्राकृतिक मैथुन के दोषी होने पर (3) भरण-पोषण की डिक्री  (4) यौवनावस्था का विकल्प

अधिनियम किसी विशिष्ट आधार को नहीं बताता है जिस पर न्यायिक पृथक्ककरण की डिक्री को बातिल या विखण्डित किया जा सकता है  (एस० नरसिम्हा बनाम विजय बाई, ए० आई० आर० 1978 कर्ना० 115)

अध्याय 4

विवाह की अकृतता और विवाह-विच्छेद

  1. शून्य विवाह— इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् अनुष्ठापित कोई भी विवाह, यदि वह धारा 5 के खण्ड (i), (iv) और (v) में विनिर्दिष्ट शर्तों में से किसी एक का भी उल्लंघन करता हो तो, अकृत और शून्य होगा और विवाह के किसी पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार के विरुद्ध उपस्थापित अर्जी पर अंकृतता की डिक्री द्वारा ऐसा घोषित किया जा सकेगा ।

टिप्पणी

यदि हिन्दू विधि में विवाह धारा 5 में वर्णित शर्तों को पूरा नहीं करता है तो वह शून्य होगा। (श्रीमती कृष्णा देवी बनाम तुलसी देवी, ए० आई० आर० 1972 पं० और हरियाणा 305)

पति द्वारा विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त किये बिना किया गया दूसरा विवाह शून्य एवं अकृत होगा। (श्रीमती दलजीत कौर उर्फ टोनी बनाम श्रीमती अमरजीत कौर, ए० आई० आर० 2009 पंजाब एण्ड हरियाणा 118)

  1. शून्यकरणीय विवाह– (1) कोई भी विवाह, वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के चाहे पूर्व अनुष्ठापित हुआ हो चाहे पश्चात्, निम्नलिखित आधारों में से किसी पर भी शून्यकरणीय होगा और अकृतता की डिक्री द्वारा बातिल किया जा सकेगा :

(क) कि प्रत्यर्थी की नपुंसकता के कारण विवाहोत्तर संभोग नहीं हुआ है; या.

(ख) कि विवाह धारा 5 के खण्ड (ii) में विनिर्दिष्ट शर्तों का उल्लंघन करता है; या

(ग) कि अर्जीदार की सम्मति या, जहां कि 1[ धारा 5 जिस रूप में बाल विवाह अवरोध (संशोधन)

अधिनियम, 1978 (1978 का 2) के प्रारम्भ के ठीक पूर्व विद्यमान थी उस रूप में उसके अधीन अर्जीदार के विवाहार्थ संरक्षक की सम्मति अपेक्षित हो वहां ऐसे संरक्षक की सम्मति, बल प्रयोग द्वारा या कर्मकाण्ड की प्रकृति के बारे में या प्रत्यर्थी से संबंधित किसी तात्विक तथ्य या परिस्थिति के बारे में कपट द्वारा अभिप्राप्त की गई थी; या । ”

(घ) कि प्रत्यर्थी विवाह के समय अर्जीदार से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा गर्भवती थी

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुये भी, विवाह के बातिलीकरण की कोई अर्जी—

(क) उपधारा (1) के खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट आधार पर ग्रहण न की जायेगी, यदि —

(i) अर्जी, यथास्थिति, बल प्रयोग के प्रवर्तनहीन हो जाने के या कपट का पता चल जाने के

एकाधिक वर्ष के पश्चात् दी जाय ; या

  1. 1978 के अधिनियम संख्या 2 द्वारा प्रतिस्थापित

 

(ii) अर्जीदार, यथास्थिति, बल प्रयोग के प्रवर्तनहीन हो जाने के या कपट का पता चल जाने के पश्चात् विवाह के दूसरे पक्षकार के साथ अपनी पूर्ण सम्मति से पति या पत्नी के रूप में रहा या रही है

(ख) उपधारा (1) के खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट आधार पर तब तक ग्रहण न की जाएगी जब तक कि न्यायालय का यह समाधान न हो जाए कि—

(i) अर्जीदार विवाह के समय अभिकथित तथ्यों से अनभिज्ञ था ;

(ii) कार्यवाही, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुष्ठापित विवाह की दशा में, ऐसे प्रारम्भ के एक वर्ष के भीतर और ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् अनुष्ठापित विवाहों की दशा में, विवाह

की तारीख से एक वर्ष के भीतर संस्थित की गई है ; और

(iii) उक्त आधार के अस्तित्व का अर्जीदार को पता चलने के समय से अर्जीदार की सम्मति से कोई वैवाहिक संभोग नहीं हुआ है ।

टिप्पणी

जहाँ विवाह के पूर्व पत्नी द्वारा गर्भवती होने की बात स्वीकार की जाती है, जबकि पति का उससे कभी किसी प्रकार का मिलन नहीं हुआ था, तब मामला धारा 12 (1) (घ) के अन्तर्गत आता है। (महेन्द्र बनाम सुशीला बाई, ए० आई० आर० 1965 सुप्रीम कोर्ट  364)

 

  1. विवाह-विच्छेद– (1) कोई भी विवाह, वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के चाहे पूर्व अनुष्ठापित हुआ हो चाहे पश्चात्, पति अथवा पत्नी द्वारा उपस्थापित अर्जी पर विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा इस आधार पर विघटित किया जा सकेगा कि

(i) दूसरे पक्षकार ने विवाह के अनुष्ठापन के पश्चात् अपने पति या अपनी पत्नी से भिन्न किसी व्यक्ति के साथ स्वेच्छया मैथुन किया है; या ।

(i-क) दूसरे पक्षकार ने विवाह के अनुष्ठापन के पश्चात् अर्जीदार के साथ क्रूरता का व्यवहार किया है या

(i-ख) दूसरे पक्षकार ने अर्जी के पेश किए जाने के अव्यवहित पूर्व कम से कम दो वर्ष की निरन्तर | कालावधि पर अर्जीदार को अभित्यक्त रखा है; या]

(ii) दूसरा पक्षकार अन्य धर्म में संपरिवर्तित हो जाने के कारण हिन्दू नहीं रह गया है ; या

2 [(iii) दूसरा पक्षकार असाध्य रूप से विकृत-चित्त रहा है अथवा निरन्तर या आंतरायिक रूप से इस प्रकार के और इस हद तक मानसिक विकार से पीड़ित रहा है कि अर्जीदार से युक्तियुक्त रूप से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह प्रत्यर्थी के साथ रहे

स्पष्टीकरण-इस खण्ड में,

(क) “मानसिक विकार” पद से मानसिक बीमारी, मस्तिष्क का संरोध या अपूर्ण विकास, मनोविकृति या मस्तिष्क का कोई अन्य विकार या नि:शक्तता अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत विखंडित मनस्कता भी है ;

(ख) “मनोविकृति” पद से मस्तिष्क का दीर्घस्थायी विकार या नि:शक्तता (चाहे इसमें बुद्धि की अवसामान्यता हो या नहीं) अभिप्रेत है जिसके परिणामस्वरूप दूसरे पक्षकार का आचरण असामान्य रूप से आक्रामक या गंभीर रूप से अनुत्तरदायी हो जाता है और चाहे उसके लिए चिकित्सीय उपचार अपेक्षित हो या नहीं अथवा ऐसा उपचार किया जा सकता हो या नहीं; या]

(iv) दूसरा पक्षकार उग्र और असाध्य कुष्ठ से पीड़ित रहा है; या

(v) दूसरा पक्षकार संचारी रूप से रतिज रोग से पीड़ित रहा है ; या

(vi) दूसरा पक्षकार किसी धार्मिक पंथ के अनुसार प्रव्रज्या ग्रहण कर चुका है ; या

(vii) दूसरा पक्षकार जीवित है या नहीं इसके बारे में सात वर्ष या उससे अधिक की कालावधि के भीतर उन्होंने कुछ नहीं सुना है जिन्होंने उसके बारे में यदि वह पक्षकार जीवित होता तो स्वाभाविकतः सुना होता। |

[स्पष्टीकरण-इस उपधारा में ” अभियजन” पद से विवाह के दूसरे पक्षकार द्वारा अर्जीदार का ऐसा. अभित्यजन अभिप्रेत है जो युक्तियुक्त कारण के बिना और ऐसे पक्षकार की सम्मति के बिना या इच्छा के विरुद्ध हो और इसके अन्तर्गत विवाह के दूसरे पक्षकार द्वारा जानबूझकर अर्जीदार की उपेक्षा करना भी है और इस पद के व्याकरणिक रूप भेदों तथा सजातीय पदों के अर्थ तदनुसार लगाए जाएंगे।]

(1-क) विवाह का कोई भी पक्षकार, विवाह इस अधिनियम के प्रारंभ के चाहे पूर्व अनुष्ठापित हुआ हो चाहे पश्चात्, विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन के लिए इस आधार पर भी अर्जी उपस्थापित कर सकेगा—

  • कि ऐसा कार्यवाही में पारित, जिसके उस विवाह के पक्षकार, पक्षकार थे, न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के धारण के पश्चात् 2[एक वर्ष] या उससे ऊपर की कालावधि भर उन पक्षकारों के बीच सहवास का कोई पुनरारम्भ नहीं हुआ है ; या
  • कि ऐसी कार्यवाही में पारित, जिसके उस विवाह के पक्षकार, पक्षकार थे, दाम्पत्याधिकार के प्रत्यास्थापन की डिक्री के पश्चात् [एक वर्ष] या उससे ऊपर की कालावधि भर, उन पक्षकारों के बीच दाम्पत्याधिकारों का कोई प्रत्यास्थापन नहीं हुआ है

(2) पत्नी विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा अपने विवाह के विघटन के लिए इस आधार पर भी अर्जी उपस्थापित कर सकेगी–

(i) कि इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व अनुष्ठापित विवाह की दशा में, पति ने ऐसे प्रारंभ के पूर्व

फिर विवाह कर लिया था या कि अर्जीदार के विवाह के अनुष्ठापन के समय पति की कोई ऐसी । दूसरी पत्नी जीवित थी जिसके साथ उसका विवाह ऐसे प्रारंभ के पूर्व हुआ था :

परन्तु यह तब जब कि दोनों दशाओं में दूसरी पत्नी अर्जी के उपस्थापन के समय जीवित हो ; या

(ii) कि पति विवाह के अनुष्ठापन के पश्चात् बलात्संग, गुदामैथुन या 3[पशुगमन] का दोषी रहा है ; या

 

4(iii) कि हिन्दू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (1956 का 78) की धारा 18 के अधीन

वाद में या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 125 के अधीन [या दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 को 5) की तत्समान धारा 488 के अधीन] कार्यवाही में, पत्नी को भरण-पोषण दिलवाने के लिए पति के विरुद्ध, यथास्थिति, डिक्री या आदेश इस बात के होते हुए भी पारित किया गया है कि वह अलग रहती थी और ऐसी डिक्री या आदेश के पारित किए जाने के समय से एक वर्ष या उससे ऊपर की कालावधि भर पक्षकारों के बीच सहवास का पुनरारम्भ नहीं हुआ है ;

(iv) कि उसका विवाहू. (चाहे विवाहोत्तर संभोग हुआ हो या नहीं) उसकी पन्द्रह वर्ष की आयु हो जाने के पूर्व अनुष्ठापित किया गया था और उसने पन्द्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् । किन्तु अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व विवाह का निराकरण कर दिया है।]

स्पष्टीकरण-यह खण्ड उस विवाह को भी लागू होगा जो विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 को 68) के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् अनुष्ठापित किया गया है ।

टिप्पणी

पति पत्नी दोनों को प्राप्त आधार [ धारा 13 (i)]

        (1)जारता,

        (2) क्रूरता,

        (3) अभियजन,

      (4) धर्म परिवर्तन,

      (5) मानसिक विकृतचित्तता,

      (6) कोढ़,

      (7) यौन रोग,

      (8) संसार परित्याग,

      (9) सात वर्ष से लापता होना

     (10) न्यायिक पृथक्करण,

     (11) दाम्पत्य अधिकार के पुनस्र्थापन की डिक्री का पालन न होना

केवल पत्नी को प्राप्त आधार– [ धारा 13 (2)]

(1) पति द्वारा दूसरा विवाह [धारा 13 (2) (i)]

(2) पति द्वारा अप्राकृतिक मैथुन का अपराध [ धारा 13 (2) (ii)]

(3) भरण-पोषण की डिक्री [धारा 13 (2) (iii)]

(4) यौवन का विकल्प [धारा 13 (2) (v)]

व्यभिचारिता को अप्रत्यक्ष साक्ष्य या परिस्थितिजन्य साक्ष्य के द्वारा साबित किया जा सकता है। (सी० एम० श्रीवास्तव बनाम अश्विनी प्रसाद, ए० आई० आर० 1967 सुप्रीम कोर्ट 581)

अभियजन के गठन के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि समस्त वैधानिक अवधि में, अभित्यजन करने वाले पति, पत्नी में अभियजन का इरादा मौजूद रहा। (बिपिन चन्द्र बनाम प्रभावती, ए० आई० आर० 1957 सुप्रीम कोर्ट 173).

सुमन कपूर बनाम सुधीर कपूर, ए० आई० आर० 2009 सुप्रीम कोर्ट 589-आपराधिक मन:स्थिति क्रूरता का आवश्यक तत्व नहीं है। इस आधार पर अनुतोष प्रदान करने से इंकार नहीं किया जा सकता कि वहाँ सोद्देश्य या इच्छापूर्ण व्यवहार नहीं है ।

विश्वनाथ सीताराम अग्रवाल बनाम सरला विश्वनाथ अग्रवाल, ए० आई० आर० 2012 सु० को 2586-अधिव्यक्ति ‘‘क्रूरता” का मानवीय आचरण या मानवीय व्यवहार से अटूट सम्बन्ध है। क्रूरता सदैव पक्षकारों के सामाजिक स्तर या परिवेश, उनके रहन-सहन के तरीके, उनके मध्य सम्बन्ध, उनके स्वभाव तथा भावनाओं पर आधारित होती है |

मनीषा त्यागी बनाम दीपक कुमार, ए० आई० आर० 2010 सुप्रीम कोर्ट 1042- क्रूरता को स्थापित करते समय यह साबित करना पर्याप्त होता है कि एक पक्षकार का आचरण इतना असामान्य एवं स्वीकृत मानक से. इतना निम्न स्तर का है कि दूसरे पक्षकार से युक्तिसंगत रूप से इसे सहन करने की आशा नहीं की जा सकती। क्रूरता स्थापित करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि शारीरिक हिंसा का प्रयोग किया गया हो ।

के० श्रीनिवास राव बनाम डी० ए० दीपा, ए० आई० आर० 2013 सुप्रीम कोर्ट 2176–एक छत के नीचे साथ-साथ रहना मानसिक क्रूरता की पूर्व शर्त नहीं है। विवाह के पक्षकार अपने आचरण से मानसिक क्रूरता कारित कर सकते हैं, भले वे एक छत के नीचे साथ-साथ न रह रहे हों। । विद्या विश्वनाथन बनाम कार्तिक बालकृष्णन, ए० आई० आर० 2015 सुप्रीम कोर्ट 285-यदि लैंगिक संभोग अनुचित रूप से इंकार किया गया है और ऐसा इंकार दीर्घकाल से हठ के रूप में किया गया है, तो यह विनिश्चय करने के लिए आधार होगा कि यहाँ विधिक क्रूरता है ।

पक्षकारों का लम्बे समय से पृथक-पृथक रहना मात्र विवाह-विच्छेद का आधार नहीं हो सकता। (सुनील कुमार बनाम नीलम, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 2156 पंजाब एण्ड हरियाणा)

जहाँ पति द्वारा पत्नी को अपने साथ रहने की अनुमति नहीं दिये जाने के कारण पत्नी उसी मकान में पति से पृथक रहने लग जाती है। वहाँ इसे पत्नी की ओर से पति अधित्यजन नहीं कहा जा सकता। (खड़क सिंह धापोला बनाम श्रीमती सरोजिनी धापोला, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 2157 उत्तरांचल).

पत्नी द्वारा पति की सहमति के बिना गर्भपात करा लेना पति के प्रति क्रूरता है। (गिरीश डंगवाल बनाम सुषमा डंगवाल, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 1905 उत्तरांचल) |

 

1[13-क, विवाह-विच्छेद की कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी को वैकल्पिक अनुतोष– इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन के लिए अर्जी पर, उस दशा को छोड़कर जिसमें अर्जी धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (ii), (vi) और (vii) में वर्णित आधारों पर है, यदि न्यायालय मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह न्यायसंगत समझता है तो, वह विवाहविच्छेद की डिक्री के बजाय न्यायिक पृथक्करण के लिए डिक्री पारित कर सकेगा ।

13-ख. पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद– (1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि विवाह के दोनों पक्षकार मिलकर विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन के लिए अर्जी, चाहे ऐसा विवाह, विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् अनुष्ठापित किया गया हो, जिला न्यायालय में, इस आधार पर पेश कर सकेंगे कि वे एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं और वे एक साथ नहीं रह सके हैं तथा वे इस बात के लिए परस्पर सहमत हो गए हैं कि विवाह का विघटन कर दिया जाना चाहिए। | (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अर्जी के पेश किए जाने की तारीख से छह मास के पश्चात् और उस तारीख से अठारह मास के पूर्व दोनों पक्षकारों द्वारा किए गए प्रस्ताव पर, यदि इस बीच अर्जी वापस नहीं ले ली गई है तो, न्यायालय पक्षकारों को सुनने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, अपना यह समाधान कर लेने पर कि विवाह अनुष्ठापित हुआ है और अर्जी में किए गए प्रकथन सही हैं, यह घोषणा करते हुए विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करेगा कि विवाह डिक्री की तारीख से विघटित हो जाएगा ।

टिप्पणी

अनिल कुमार जैन बनाम माया जैन, ए० आई० आर० 2010 सुप्रीम कोर्ट  229-सर्वोच्च न्यायालय के अतिरिक्त अन्य कोई न्यायालय ऐसी स्थिति में जबकि सहमति देने वाले पक्षकारों में से कोई पक्षकार अपनी सहमति वापस ले लेता/लेती है, तो पारस्परिक सहमति के द्वारा विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति पारित करने के लिए सक्षम नहीं है। केवल सर्वोच्च न्यायालय ही संविधान के अनुच्छेद 142 के अन्तर्गत अपनी असामान्य शक्तियों का प्रयोग करते हुए पक्षकारों को पूर्ण न्याय प्रदान करने हेतु पारस्परिक सहमति से विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति ऐसी स्थिति में पारित कर सकता है ।

हितेश भटनागर बनाम दीपा भटनागर, ए० आई० आर० 2011 सुप्रीम कोर्ट 1637-अधिनियम की धारा 13-बी (2) में प्रयुक्त भाषा स्पष्ट है। यदि निम्नांकित शर्ते पूरी होती हैं तो आज्ञप्ति की तिथि से प्रभाव में आने वाली पारस्परिक सहमति से विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति पारित करने हेतु न्यायालय बाध्य है—

(1) दोनों पक्षकारों का द्वितीय संकल्प (motion) याचिका दायर करने की तिथि से कम-से-कम 6 महीने के पश्चात् एवं अधिकतम 18 महीने के भीतर संस्थित किया गया हो ;

(2) पक्षकारों को सुनने एवं ऐसी जांच करने के पश्चात् जो न्यायालय उचित समझे, न्यायालय संतुष्ट हो कि याचिका में किये गये कथन सत्य हैं, तथा

(3) याचिका किसी पक्षकार द्वारा आज्ञप्ति पारित होने के पूर्व किसी समय वापस न ली गयी हो

परस्पर सहमति के आधार पर विवाह विच्छेद की याचिका का एक पक्षकार विवाह विच्छेद की डिक्री पारित होने के पूर्व तक किसी समय अपनी सहमति वापस ले सकता है। यदि याचिका दायर किये जाने के पश्चात् याचिका के दोनों पक्षकारों द्वारा संयुक्त समावेदन नहीं दायर किया नाता है तो न्यायालय को धारा 13-ख तहत डिक्री पारित करने की अधिकारिता प्राप्त नहीं होगी। (सुरेष्ठा देवी बनाम ओम प्रकाश, ए० आई० आर० 1992 सुप्रीम कोर्ट 1904)

पारस्परिक सहमति के आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करने से पूर्व न्यायालय को यह समाधान कर लेना चाहिये कि सम्मति दबाव, कपट अथवा असम्यक् असर द्वारा प्राप्त नहीं की गई है। (सौ० सुषमा प्रमोद तकसानदे बनाम प्रमोद रामजी तकसानदे, ए० आई० आर० 2009 बम्बई 117)

 

  1. विवाह से एक वर्ष के भीतर विवाह– विच्छेद के लिए कोई अर्जी उपस्थापित न की जाएगी–(1) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई भी न्यायालय विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन की कोई अर्जी ग्रहण करने के लिए तब तक सक्षम न होगा जब तक कि विवाह की तारीख से उस 1[अर्जी के पेश किए जाने की तारीख तक] एक वर्ष बीत न चुका हो :

परन्तु न्यायालय उन नियमों के अनुसार किए गए आवेदन पर, जो उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, किसी अर्जी का, विवाह की तारीख से एक 1[वर्ष बीतने के पूर्व भी इस आधार पर उपस्थापित किया जाना अनुज्ञात कर सकेगा कि मामला अर्जीदार के लिए असाधारण कष्ट का है या प्रत्यर्थी की असाधारण दुराचारिता से युक्त है; किन्तु यदि अर्जी की सुनवाई के समय न्यायालय को यह प्रतीत हो कि अर्जीदार ने अर्जी को उपस्थापित करने की इजाजत किसी दुर्व्यपदेशन या मामले की प्रकृति के प्रच्छादन द्वारा अभिप्राप्त की थी तो वह, डिक्री देने की दशा में, इस शर्त के अध्यधीन डिक्री दे सकेगा कि डिक्री तब तक संप्रभाव न होगी जब तक कि विवाह की तारीख से 1[एक वर्ष का अवसान न हो जाए] अथवा उस अर्जी को ऐसी किसी अर्जी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना खारिज कर सकेगा जो उक्त [एक वर्ष के अवसान के पश्चात्] उन्हीं या सारतः उन्हीं तथ्यों पर दी जाए जो ऐसे खारिज की गई अर्जी के समर्थन में अभिकथित किए गए थे। | (2) विवाह की तारीख से 1[एक वर्ष के अवसान] से पूर्व विवाह-विच्छेदन की अर्जी उपस्थापित करने की इजाजत के लिए इस धारा के अधीन किए गए किसी आवेदन का निपटारा करने में न्यायालय उस विवाह से उत्पन्न किसी अपत्य के हितों पर तथा इस बात पर ध्यान रखेगा कि पक्षकारों के बीच उक्त 1[एक वर्ष के अवसान] से हुई पूर्व मेल-मिलाप की कोई युक्तियुक्त संभावनीयता है या नहीं ।

 

  1. कब विवाह-विच्छेद प्राप्त व्यक्ति पुनः विवाह कर सकेगा– जब कि विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह विघटित कर दिया गया हो और या तो डिक्री के विरुद्ध अपील करने का कोई अधिकार ही न हो या यदि अपील का ऐसा अधिकार हो तो अपील करने के समय का कोई अपील उपस्थापित हुए बिना अवसान हो गया हो या अपील की तो गई हो किन्तु खारिज कर दी गई हो तब विवाह के किसी पक्षकार के लिए पुनः विवाह करना विधिपूर्ण होगा ।
  2. शून्य और शून्यकरणीय विवाहों के अपत्यों की धर्मजता– (1) इस बात के होते हुए भी कि विवाह धारा 11 के अधीन अकृत और शून्य है, ऐसे विवाह का ऐसा अपत्य धर्मज होगा, जो विवाह के विधिमान्य होने की दशा में धर्मज होता चाहे ऐसे अपत्य का जन्म विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारंभ से पूर्व या उसके पश्चात् हुआ हो और चाहे उस विवाह के संबंध में अकृतता की डिक्री इस अधिनियम के अधीन मंजूर की गई हो या नहीं और चाहे वह विवाह इस अधिनियम के अधीन अर्जी से भिन्न आधार पर शून्य अभिनिर्धारित किया गंया हो या नहीं |

(2) जहां धारा 12 के अधीन शून्यकरणीय विवाह के संबंध में अकृतता की डिक्री मंजूर की जाती है। वहां डिक्री की जाने से पूर्व जनित या गर्भाहित ऐसा कोई अपत्य, जो यदि विवाह डिक्री की तारीख को अकृत की जाने की बजाय विघटित कर दिया गया होता तो विवाह के पक्षकारों का धर्मज अपत्य होता, अकृतता की डिक्री होते हुए भी उनका धर्मज अपत्य समझा जाएगा ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह ऐसे विवाह के किसी ऐसे अपत्य को, जो अकृत और शून्य है या जिसे धारा 12 के अधीन अकृतता की डिक्री द्वारा अकृत किया गया है, उसके माता-पिता से भिन्न किसी व्यक्ति की सम्पत्ति में या सम्पत्ति के लिए कोई अधिकार किसी ऐसी दशा में प्रदान करती है जिसमें कि यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो वह अपत्य अपने माता-पिता का धर्मज अपत्य न होने के कारण ऐसा कोई अधिकार रखने या अर्जित करने में असमर्थ होता ।]

टिप्पणी

रेवनासिदप्पा बनाम मल्लिकार्जुन, (2011) II एस० सी० सी० 1-सर्वोच्च न्यायालय ने यह अवधारित किया है कि धारा 16 को अधिनियम में प्रविष्ट करके संसद ने-(क) अभिव्यक्त रूप से अपत्यों को धर्मज के रूप में सन्दर्भित करके अधर्मजतो के कलंक को दूर कर दिया है; (ख) धारा ‘सम्पत्ति’ शब्द का प्रयोग करती है और इसे पृथक अथवा पैतृक के रूप में सीमित नहीं करती है; (ग) हिन्दू विवाह अधिनियम के द्वारा सामाजिक सुधार लाया गया है; (घ) माता-पिता की मूर्खता की छाया अपत्यों के अधिकारों पर नहीं पड़नी चाहिए, क्योंकि वे निर्दोष होते हैं ।

कोई कारण नहीं है कि शून्य अथवा शून्यकरणीय विवाह की संतानों का संयुक्त परिवार की सम्पत्ति में कोई अंश नहीं होगा, क्योंकि संशोधित अधिनियम के अन्तर्गत उनकी स्थिति विधिमान्य विवाह की संतानों के समान कर दी गयी है।

भारत मथ बनाम विजय रंगनाथन, ए० आई० आर० 2010 सुप्रीम कोर्ट 2685- लिव-इन-रिलेशनशिप से उत्पन्न अधर्मज सन्ताने सहदायिकी सम्पत्ति में उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकती हैं ।

  1. द्विविवाह के लिए दंड– यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् दो हिन्दुओं के बीच अनुष्ठापित किसी विवाह की तारीख पर ऐसे विवाह के किसी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित था या थी तो ऐसा विवाह शून्य होगा और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 494 और 495 के उपबन्ध उसे तदनुसार लागू होंगे ।
  2. हिन्दू विवाह की कतिपय अन्य शर्तो के उल्लंघन के लिए दंड– हर व्यक्ति जो अपना कोई ऐसा विवाह उपाप्त करेगा जो धारा 5 के खण्ड [(iii), (iv) और (v)] में विनिर्दिष्ट शर्तो के उल्लंघन में इस अधिनियम के अधीन अनुष्ठापित किया गया हो वह — (क) धारा 5 के खण्ड (iii) में विनिर्दिष्ट शर्त के उल्लंघन की दशा में, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से;] (ख) धारा 5 के खण्ड (iv) या खण्ड (v) में विनिर्दिष्ट शर्त के उल्लंघन की दशा में, सादे कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से  (ग) 3[xx x] (1978 के अधिनियम संख्या 2 द्वारा विलोपित )

 

अध्याय 5

अधिकारिता और प्रक्रिया

4[19, वह न्यायालय जिसमें अर्जी उपस्थापित की जाएगी-इस अधिनियम के अधीन हर अर्जी उस जिला न्यायालय के समक्ष पेश की जाएगी जिसकी मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर —

(i) विवाह का अनुष्ठापन हुआ था; या (ii) प्रत्यर्थी, अर्जी के पेश किए जाने के समय, निवास करता है; या (iii) विवाह के पक्षकारों ने अंतिम बार एक साथ निवास किया था; या  [(iii-क) यदि पत्नी अर्जीदार है तो जहां वह अर्जी पेश किए जाने के समय निवास कर रही है; या]  (iv) अर्जीदार के अर्जी पेश किए जाने के समय निवास कर रहा है, यह ऐसे मामले में, जिसमें प्रत्यर्थी उस समय ऐसे राज्यक्षेत्र के बाहर निवास कर रहा है जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है अथवा वह जीवित है या नहीं इसके बारे में सात वर्ष या उससे अधिक की कालावधि के भीतर उन्होंने कुछ नहीं सुना है, जिन्होंने उसके बारे में, यदि वह जीवित होता तो, स्वाभाविकतया सुना होता।]

टिप्पणी

श्रीमती जीवन्ती पाण्डे बनाम किशन चन्द्र पाण्डे, ए० आई० आर० 1982 एस० सी० 3 के मामले में अवधारण प्रदान किया गया कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 19 के खण्ड (ii) में आए ”निवास करता है” शब्द से अवश्य ही वास्तविक निवास अभिप्रेत है न कि कोई विधिक या आन्वयिक ।

 

  1. अर्जियों की अन्तर्वस्तु और सत्यापन– (1) इस धारा के अधीन उपस्थापित हर अर्जी उन तथ्यों को जिन पर अनुतोष का दावा आधारित हो इतने स्पष्ट तौर पर कथित करेगी जितना उस मामले की प्रकृति अनुज्ञात करे और धारा 11 के अधीन अर्जी को छोड़कर ऐसी हर अर्जी यह भी कथित करेगी कि अर्जीदार और विवाह के दूसरे पक्षकार के बीच कोई सन्धि नहीं है। |

(2) यह अधिनियम के अधीन दी जाने वाली हर अर्जी में अन्तर्विष्ट कथन वादपत्रों के सत्यापन के लिए विधि द्वारा अपेक्षित रीति से अर्जीदार या अन्य सक्षम व्यक्ति द्वारा सत्यापित किए जाएंगे और सुनवाई के समय साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होंगे ।

21, 1908 के अधिनियम संख्यांक 5 का लागू होना  इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के और उन नियमों के जो उच्च न्यायालय इस निमित्त बनाए, अध्यधीन यह है कि इस अधिनियम के अधीन सब कार्यवाहियां जहां तक हो सकेगा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 द्वारा विनियमित होंगी ।

1[21-क, कुछ मामलों में अर्जियों को अन्तरित करने की शक्ति  (1) जहां

(क) इस अधिनियम के अधीन कोई अर्जी अधिकारिता रखने वाले जिला न्यायालय में विवाह के किसी पक्षकार द्वारा धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए या धारा 13 के अधीन विवाह-विच्छेद की डिक्री के लिए प्रार्थना करते हुए पेश की गई है; और

(ख) उसके पश्चात् इस अधिनियम के अधीन कोई दूसरी अर्जी विवाह के दूसरे पक्षकार द्वारा किसी आधार पर धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए या धारा 13 के अधीन विवाह-विच्छेद की डिक्री के लिए प्रार्थना करते हुए, चाहे उसी जिला न्यायालय में अथवा उसी राज्य के या किसी भिन्न राज्य के किसी भिन्न जिला न्यायालय में पेश की गई है,

वहां ऐसी अर्जियों के संबंध में उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट रीति से कार्यवाही की जाएगी ।

(2) ऐसे मामले में जिसे उपधारा (1) लागू होती है–

(क) यदि ऐसी अर्जियां एक ही जिला न्यायालय में पेश की जाती हैं तो दोनों अर्जियों का विचारण और उनकी सुनवाई उस जिला न्यायालय द्वारा एक साथ की जाएगी

(ख) यदि ऐसी अर्जियां भिन्न-भिन्न जिला न्यायालयों में पेश की जाती हैं तो बाद वाली पेश की गई अर्जी उस जिला न्यायालय को अन्तरित की जाएगी जिसमें पहले वाली अर्जी पेश की गई थी। और दोनों अर्जियों की सुनवाई और उनका निपटारा उस जिला न्यायालय द्वारा एक साथ किया जाएगा जिसमें पहले वाली अर्जी की गई थी। |

(3) ऐसे मामले में, जिसे उपधारा (2) का खंड (ख) लागू होता है, यथास्थिति, वह न्यायालय या सरकार, जो किसी वाद या कार्यवाही को उस जिला न्यायालय से, जिसमें बाद वाली अर्जी पेश की गई है, उच्च न्यायालय को जिसमें पहले वाली अर्जी लम्बित है, अन्तरित करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सक्षम है, ऐसी बाद वाली अर्जी का अन्तरण करने के लिए अपनी शक्तियों का वैसे ही प्रयोग करेगी मानो वह उक्त संहिता के अधीन ऐसा करने के लिए सशक्त की गई है

21-ख. इस अधिनियम के अधीन अर्जियों के विचारण और निपटारे से सम्बन्धित विशेष उपबन्ध  (1) इस अधिनियम के अधीन अर्जी का विचारण, जहां तक कि न्याय के हित से संगत रहते हुए उस विचारण के बारे में साध्य हो, दिन प्रतिदिन तब तक निरन्तर चालू रहेगा जब तक कि वह समाप्त न हो जाए किन्तु उस दशा में नहीं जिसमें न्यायालय विचारण का अगले दिन से परे के लिए स्थगन उन कारणों से आवश्यक समझे जो लेखबद्ध किए जाएंगे

(2) इस अधिनियम के अधीन हर अर्जी का विचारण जहां तक संभव हो शीघ्र किया जाएगा और प्रत्यर्थी पर अर्जी की सूचना की तामील होने की तारीख से छह मास के अन्दर विचारण समाप्त करने का प्रयास किया जाएगा

(3) इस अधिनियम के अधीन हर अपील की सुनवाई जहां तक संभव हो शीघ्र की जाएगी और प्रत्यर्थी पर अपील की सूचना की तामील होने की तारीख से तीन मास के अंदर सुनवाई समाप्त करने का प्रयास किया जाएगा

21-ग. दस्तावेजी साक्ष्य– किसी अधिनियमिति में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी यह है कि इस अधिनियम के अधीन अर्जी के विचारण को किसी कार्यवाही में कोई दस्तावेज साक्ष्य में इस आधार पर अग्राह्य नहीं होगा कि वह सम्यक् रूप से स्टाम्पित या रजिस्ट्रीकृत नहीं है।]

[22. कार्यवाहियों को बन्द कमरे में होना उन्हें मुद्रित या प्रकाशित न किया जाना— (1) इस अधिनियम के अधीन हर कार्यवाही बन्द कमरे में की जाएगी और किसी व्यक्ति के लिए ऐसी किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में किसी बात को मुद्रित या प्रकाशित करना विधिपूर्ण नहीं होगा किन्तु उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय को छोड़कर जो उस न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा से मुद्रित या प्रकाशित किया गया है। | (2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबन्धों के उल्लंघन में कोई बात मुद्रित या प्रकाशित करेगा तो वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।]

टिप्पणी

बन्द कमरे में संचालित वैवाहिक कार्यवाहियों को न तो प्रकाशित किया जा सकता है और न ही टेलिकास्ट । इससे एकान्तता एवं स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार का हनन होता है। (आर० सुकन्या बनाम आर० श्रीधर, ए० आई० आर० 2008 मद्रास 244)

  1. कार्यवाहियों में डिक्री– (1) यदि इस अधिनियम के अधीन होने वाली किसी कार्यवाही में, चाहे उसमें प्रतिरक्षा की गई हो या नहीं, न्यायालय का समाधान हो जाए कि—

(क)  अनुतोष अनुदत्त करने के आधारों में से कोई न कोई आधार विद्यमान है और अर्जीदार  [उन मामलों को छोड़कर जिनमें उसके द्वारा धारा 5 के खण्ड (ii) के उपखण्ड (क), उपखण्ड (ख) या उपखण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट आधार पर अनुतोष चाहा गया है। अनुतोष के प्रयोजन से अपने ही दोष या निर्योग्यता का किसी प्रकार फायदा नहीं उठा रहा या उठा रही है, और

(ख) जहां कि अर्जी का आधार धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (i) में विनिर्दिष्ट आधार हो वहां न तो अर्जीदार परिवादित कार्य या कार्यों का किसी प्रकार से उपसाधक रहा है और न उसने उनका मौनानुमोदन या उपमर्षण किया है अथवा जहां कि अर्जी का आधार क्रूरता हो वहां अर्जीदार ने उस क्रूरता का किसी प्रकार उपमर्षण नहीं किया है, और

(खख) जब विवाह-विच्छेद पारस्परिक सम्मति के आधार पर चाहा गया है और ऐसी सम्मति बल, कपट या असम्यक् असर द्वारा अभिप्राप्त नहीं की गई है, और]

(ग) अर्जी [ (जो धारा 11 के अधीन पेश की गई अर्जी नहीं है)] प्रत्यर्थी के साथ दुस्सन्धि करके उपस्थापित या अभियोजित नहीं की जाती है, और

(घ) कार्यवाही संस्थित करने में कोई अनावश्यक या अनुचित विलम्ब नहीं हुआ है, और

(ङ) अनुतोष अनुदत्त न करने के लिए कोई अन्य वैध आधार नहीं है, तो ऐसी ही दशा में, किन्तु अन्यथा नहीं, न्यायालय तदनुसार ऐसा अनुतोष डिक्री कर देगा

(2) इस अधिनियम के अधीन कोई अनुतोष अनुदत्त करने के लिए अग्रसर होने के पूर्व यह न्यायालय का प्रथमतः कर्तव्य होगा कि वह ऐसी हर दशा में, जहां कि मामले की प्रकृति और परिस्थितियों से संगत रहते हुए ऐसा करना सम्भव हो, पक्षकारों के बीच मेल-मिलाप कराने का पूर्ण प्रयास करे : |

[परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसी कार्यवाही को लागू नहीं होगी जिसमें धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (ii), खण्ड (iii), खण्ड (iv), खण्ड (v), खण्ड (vi), या खण्ड (vii) में विनिर्दिष्ट आधारों में से किसी आधार पर अनुतोष चाहा गया है

(3) ऐसा मेल-मिलाप कराने में न्यायालय की सहायता के प्रयोजन के लिए न्यायालय, यदि पक्षकार ऐसा चाहते तो या यदि न्यायालय ऐसा करना न्यायसंगत और उचित समझे तो, कार्यवाहियों को पंद्रह दिन से अनधिक की युक्तियुक्त कालावधि के लिए स्थगित कर सकेगा और उस मामले को पक्षकारों द्वारा इस निमित्त नामितं किसी व्यक्ति को या यदि पक्षकार कोई व्यक्ति नामित करने में असफल रहते हैं तो न्यायालय द्वारा नामनिर्देशित किसी व्यक्ति को इन निदेशों के साथ निर्देशित कर सकेगा कि वह न्यायालय को इस बारे में रिपोर्ट दे कि मेल-मिलाप कराया जा सकता है या नहीं तथा करा दिया गया है या नहीं और न्यायालय कार्यवाही का निपटारा करने में ऐसी रिपोर्ट को सम्यक् रूप से ध्यान में रखेगा

(4) ऐसे हर मामले में, जिसमें विवाह विघटन विवाह-विच्छेद द्वारा होता है, डिक्री पारित करने वाला न्यायालय हर पक्षकार को उसकी प्रति मुफ्त देगा

[23-क. विवाह-विच्छेद और अन्य कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी को अनुतोष– विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण या दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए किसी कार्यवाही में प्रत्यर्थी अर्जीदार के जारकर्म, क्रूरता या अभियजन के आधार पर चाहे गए अनुतोष का न केवल विरोध कर सकेगा बल्कि वह उस आधार पर इस अधिनियम के अधीन किसी अनुतोष के लिए प्रतिदावा भी कर सकेगा और यदि अर्जीदार का जारकर्म, क्रूरता या अभियजन साबित हो जाता है तो न्यायालय प्रत्यर्थी को इस अधिनियम के अधीन कोई ऐसा अनुतोष दे सकेगा जिसके लिए वह उस दशा में हकदार होता या होती जिसमें उसने उस आधार पर ऐसे अनुतोष की मांग करते हुए अर्जी उपस्थापित की होती ।] | 24. वाद लम्बित रहते भरण-पोषण और कार्यवाहियों के व्यय-जहां कि इस अधिनियम के अधीन होने वाली किसी कार्यवाही में न्यायालय को यह प्रतीत हो कि, यथास्थिति, पति या पत्नी की ऐसी कोई स्वतंत्र आय नहीं है जो उसके संभारा और कार्यवाही के आवश्यक व्ययों के लिए पर्याप्त हो वहां वह पति या पत्नी के आवेदन पर प्रत्यर्थी को यह आदेश दे सकेगा कि अर्जीदार को कार्यवाही में होने वाले व्यय तथा कार्यवाही के दौरान में प्रतिमास ऐसी राशि संदत करे जो अर्जीदार की अपनी आय तथा प्रत्यर्थी की आय को देखते हुए न्यायालय को युक्तियुक्त प्रतीत होती हो :

परन्तु कार्यवाही के व्ययों और कार्यवाही के दौरान ऐसी मासिक राशि के संदाय के लिए आवेदन को यथासंभव, यथास्थिति, पत्नी या पति पर सूचना की तामील की तारीख से, साठ दिन के भीतर निपटाया जाएगा

टिप्पणी

जहां पति की मासिक आय एक लाख रुपये बताई गई हो, वहाँ पत्नी 33,000/- रुपये प्रतिमाह अन्तरिम भरण पोषण पाने की हकदार है। (आशीष गुप्ता बनाम नलिनी गुप्ता, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 2151 दिल्ली)

पत्नी पति की क्रूरता के कारण शारीरिक एवं मानसिक रूप से पीड़ित थी। उसकी आय का कोई साधन नहीं था। पति हृष्टपुष्ट व्यक्ति था। उसकी ओर से पत्नी को 1500/- रुपये प्रतिमाह का भरण-पोषण व 5500/- रुपये वाद व्यय दिलाया जाना न्यायोचित है। (मनप्रीत सिंह बनाम मनदीप कौर, ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 1901 पंजाब एंड हरियाणा ।)

  1. स्थायी निर्वाहिका और भरण-पोषण- (1) इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग कर रहा कोई भी न्यायालय, डिक्री पारित करने के समय या उसके पश्चात् किसी भी समय, यथास्थिति, पति या पत्नी, द्वारा इस प्रयोजन से किए गए आवेदन पर, यह आदेश दे सकेगा कि प्रत्यर्थी उसके भरण-पोषण और संभाल के लिए ऐसी कुल राशि या ऐसी मासिक अथवा कालिक राशि, जो प्रत्यर्थी की अपनी आय और अन्य सम्पत्ति को, यदि कोई हो आवेदक या आवेदिका की आय और अन्य सम्पत्ति को 1[तथा पक्षकारों के आचरण और मामले की अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हो, आवेदक या आवेदिका के जीवन-काल से अधिक अवधि के लिए संदत्त करे और ऐसा कोई भी संदाय यदि यह करना आवश्यक हो तो, प्रत्यर्थी की स्थावर सम्पत्ति पर भार द्वारा प्रतिभूत किया जा सकेगा

(2) यदि न्यायालय का समाधान हो जाए कि उसके उपधारा (1) के अधीन आदेश करने के पश्चात् पक्षकारों में से किसी की भी परिस्थितियों में तब्दील हो गई है तो वह किसी भी पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसी रीति से, जो न्यायालय को न्यायसंगत प्रतीत हो ऐसे किसी आदेश में फेरफार कर सकेगा या उसे उपान्तरित अथवा विखण्डित कर सकेगा

(3) यदि न्यायालय का समाधान हो जाए कि उस पक्षकार ने जिसके पक्ष में इस धारा के अधीन कोई आदेश किया गया है, पुनर्विवाह कर लिया है या यदि ऐसा पक्षकार पत्नी है [तो वह पतिव्रता नहीं रह गई है, या यदि ऐसा पक्षकार पति है तो उसने किसी स्त्री के साथ विवाहबाह्य मैथुन किया है, तो वह दूसरे पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसे किसी आदेश को ऐसी रीति में, जो न्यायालय न्यायसंगत समझे, परिवर्तित, उपांतरित या विखंडित कर सकेगा]

  1. अपत्यों की अभिरक्षा- इस अधिनियम के अधीन होने वाली किसी भी कार्यवाही में न्यायालय अप्राप्तवय अपत्यों की अभिरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के बारे में, यथासंभव उनकी इच्छा के अनुकूल, समय-समय ऐसे आदेश पारित कर सकेगा और डिक्री में ऐसे उपबन्ध कर सकेगा जिन्हें वह न्यायसंगत और उचित समझे और डिक्री के पश्चात् इस प्रयोजन से अर्जी द्वारा किए गए आवेदन पर ऐसे अपत्य की अभिरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के बारे में समय-समय पर ऐसे आदेश और उपबन्ध कर सकेगा जो ऐसी डिक्री अभिप्राप्त करने की कार्यवाही के लम्बित रहते ऐसी डिक्री या अन्तरिम आदेश द्वारा किए जा सकते थे और न्यायालय पूर्वतन किए गए ऐसे किसी आदेश या उपबंध को समय-समय पर प्रतिसंहृत या निलंबित कर सकेगा अथवा उसमें फेरफार कर सकेगा :

[परन्तु ऐसी डिक्री अभिप्राप्त करने के लिए कार्यवाही लंबित रहने तक अप्राप्तवय अपत्यों के भरणपोषण और शिक्षा की बाबत आवेदन को यथासंभव, प्रत्यर्थी पर सूचना की तामील की तारीख से, साठ दिन के भीतर निपटाया जाएगा।]

  1. सम्पत्ति का व्ययन- इस अधिनियम के अधीन होने वाली किसी भी कार्यवाही में, न्यायालय ऐसी सम्पत्ति के बारे में, जो विवाह के अवसर पर या उनके आसपास उपहार में दी गई हो और संयुक्तत: पति और पत्नी दोनों की हो, डिक्री में ऐसे उपबन्धित कर सकेगा जिन्हें वह न्यायसंगत और उचित समझे ।
  2. डिक्रियों और आदेशों की अपीलें– (1) इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में न्यायालय द्वारा दी गई सभी डिक्रियां, उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए उसी प्रकार अपीलनीय होंगी जैसे उस न्यायालय द्वारा अपनी आरम्भिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में दी गई डिक्री अपीलीय होती है और ऐसी हर अपील उस न्यायालय में होगी जिसमें उस न्यायालय द्वारा अपनी आरम्भिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में किए गए विनिश्चयों की अपीलें सामान्यत: होती हैं

(2) धारा 25 या धारा 26 के अधीन किसी कार्यवाही में न्यायालय द्वारा किए गए आदेश उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, तभी अपीलनीय होंगे जब वे अन्तरिम आदेश न हों और ऐसी हर अपील उस न्यायालय में होगी जिसमें उस न्यायालय द्वारा अपनी आरम्भिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में किए गए दिनिश्चयों की अपीलें सामान्यतः होती हैं

(3) केवल खर्चे के विषय में कोई अपील इस धारा के अधीन नहीं होगी

(4) इस धारा के अधीन हर अपील डिक्री या आदेश की तारीख से 2[नब्बे दिन की कानाव के अन्दर की जाएगी।

टिप्पणी

पारस्परिक सहमति के आधार पर पारित विवाह-विच्छेद की डिक्री के विरुद्ध अपील संधारणयोग्य है। (सौ० सुषमा प्रमोद तकसानदे बनाम प्रमोद रामजी तकसानदे, ए० आई० आर० 2009 बम्बई 113)

धारा 28 के अधीन अपील के लिए परिसीमा काल 30 दिन हैं, 90 दिन नहीं। कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम की धारा 19 में अपील के लिए परिसीमा काल 30 दिन बताया गया है। जबकि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत 90 दिन । कुटुम्ब न्यायालय चूंकि एक विशेष विधान है, अतः इसके उपबंध हिन्दू विवाह अधिनियम के उपबंधों पर अध्यारोही प्रभाव रखेंगे। (आशुतोष कुमार बनाम अंजलि श्रीवास्तव ए० आई० आर० 2009 इलाहाबाद 100)

28-क. डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन— इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में न्यायालय द्वारा दी गई सभी डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन उसी प्रकार किया जाएगा जिस प्रकार उस न्यायालय द्वारा अपनी आरंभिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में दी गई डिक्रियों और आदेशों का तत्समय प्रवर्तन किया जाता है

अध्याय 6

व्यावृत्तियाँ और निरसन

  1. व्यावृत्तियां— (1) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व हिन्दुओं के बीच, अनुष्ठापित ऐसा विवाह, जो अन्यथा विधिमान्य हो, केवल इस तथ्य के कारण अविधिमान्य या कभी अविधिमान्य रहा हुआ न समझा जाएगा कि उसके पक्षकार एक ही गोत्र या प्रवर के थे अथवा, विभिन्न धर्मों, जातियों या एक ही जाति की विभिन्न उपजातियों के थे

(2) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई भी बात रूढ़ि से मान्यता प्राप्त या किसी विशेष अधिनियमिति द्वारा प्रदत्त किसी ऐसे अधिकार पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी जो किसी हिन्दू विवाह का वह इस अधिनियम के प्रारंभ के चाहे पूर्व अनुष्ठापित हुआ हो चाहे पश्चात् विघटन अभिप्राप्त करने का अधिकार हो

(3) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई बात तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन होने वाली किसी ऐसी कार्यवाही पर प्रभाव न डालेगी जो किसी विवाह को बातिल और शून्य घोषित करने के लिए या किसी विवाह को बातिल अथवा विघटित करने के लिए या न्यायिक पृथक्करण के लिए हो और इस अधिनियम के प्रारंभ पर लम्बित हो और ऐसी कोई भी कार्यवाही चलती रहेगी और अवधारित की जाएगी मानो यह अधिनियम पारित ही न हुआ हो

(4) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई भी बात विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (1954 को 43) में अन्तर्विष्ट किसी ऐसे उपबन्ध पर प्रभाव न डालेगी. जो हिन्दुओं के बीच उस अधिनियम के अधीन, इस अधिनियम के प्रारंभ के चाहे पूर्व चाहे पश्चात् अनुष्ठापित विवाहों के संबंध में हो

  1. निरसन-[ निरसन तथा संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और प्रथम अनुसूची द्वारा निरसित (16-12-1960 से प्रभावी) ।]

जय हिन्द

द्वारा

अधिवक्ता धीरज कुमार

 

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4 Comments

  1. Arun gohil

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