आपसी सहमती से तलाक कैसे ले ? इसकी कोर्ट प्रोसेडिंग क्या है ?

प्रशन :- वकील साहब, mutual divorce आपसी सहमती से तलाक कैसे ले ? इसकी कोर्ट प्रोसेडिंग क्या होती है ? पत्नी first motion में पैसे ले कर second motion में नही आये तो पति क्या करे ?

उत्तर :-

आज कल तलाक होना एक आम बात है | लोग शिक्षित है और पैसा कमाने में व्यस्त है | वे कोर्ट के चक्कर भी नही लगाना चाहते है | इसलिए आपसी सहमती से तलाक लेने का चलन भी बड रहा है | आइये जाने आपसी तलाक कैसे ले, क्या सावधानिय बरते, इसके क्या फायदे व नुकसान है | इसका विवरण हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 B (1) और 13 B (2) में वर्णित है |

आपसी तलाक लेने से पहले की कोर्ट की शर्ते :-

आपसी सहमती से तलाक का केस फेमिली कोर्ट में फाइल करने से पहले इन शर्तो का पूर्ण होना जरूरी है :-

  1. कोर्ट का क्षेत्र अधिकार :- सबसे पहले ये सवाल उठता है की किस जगह कोर्ट में केस डाला जाये | कोर्ट में केस करने के तीन क्षेत्र है (1) वह जगह जहा पर पति-पत्नी की शादी हुई हो (2) जहा पर पति-पत्नी पहली बार एक साथ रहे हो (3) जहा पर, पति-पत्नी आखरी बार एक साथ रहे हो | इन तीन जगह के अलावा आप किसी और जगह की कोर्ट में केस नही कर सकते है |

 

  1. पति-पत्नी का एक साल तक अलग रहना :- आपसी सहमती के तलाक की दूसरी शर्त एक दुसरे से अलग रहना है (1) इसके अनुसार दोनों पति-पत्नी एक साल से अलग रह रहे होने चाहिए चाहे वो समय शादी के अगले दिन से ही शुरू होना माना जा सकता है | अलग रहने से मतलब ये है की वे दोनों एक छत के निचे नही रहे हो | एक फ्लैट में दो कमरों में नही रह सकते है लेकिन एक की अपार्टमेंट में अलग फ्लैट में रह सकते है | मतलब ये की पता अलग होना चाहिए (ख) दूसरा ये की दोनों पति-पत्नी के बिच अलग रहते हुए भी शारीरिक सम्बन्ध नही बने होने चाहिए | अगर अलग रहते हुए भी शारीरिक सम्बन्ध बन जाते है तो पिछला समय नही गिना जाएगा |

(लेकिन इसके अलावा भी आप हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 14 के अंतर्गत आवेदन करके इस 1 साल की समय सीमा को समाप्त करवा सकते है | लेकिन इसके लिए आपको कोर्ट के सामने उचित कारण देने होते है |)

  1. आपसी सहमती बिना किसी दबाव के :- दोनों पक्षो की आपसी सहमती से तलाक, स्वतंत्र रूप से बिना किसी दबाव के होना चाहिए |

कोर्ट में केस करने की कानूनी प्रकिर्या :-

आपसी सहमती से तलाक दो चरणों में होता है | इसके  लिए कोर्ट में दो बार आवेदन करने होते है | इन्हे first motion व second motion कहते है | इसके बाद तलाक हो जाता है | आइये जानते है इसकी कोर्ट प्रोसेडिंग कैसे चलती है और किन चीजो की जरूरत पड़ती है :-

1.पहला चरण first motion :-

(A) आपसी सहमती से तलाक के लिए कोर्ट में हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 B (1) के अंतर्गत आवेदन होता है जिसे हम (first motion) कहते है | जिसमे दोनों पक्षों का शादी से पहले व बाद का नाम, पता, उम्र व शादी का स्टेट्स लिखा होता है | स्टेट्स से मतलब शादी से पहले की विवाहिक स्तिथि से है जैसे की कोई इस शादी से पहले तलाक शुदा या विदुर रहा हो |

आपसी सहमती से तलाक कैसे ले ?

आपसी सहमती से तलाक कैसे ले ?

हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 B (1) का हिंदी रूपांतरण निचे दिया है :-

13-क, विवाह-विच्छेद की कार्यवाहियों में प्रत्यर्थी को वैकल्पिक अनुतोष-इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन के लिए अर्जी पर, उस दशा को छोड़कर जिसमें अर्जी धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (ii), (vi) और (vii) में वर्णित आधारों पर है, यदि न्यायालय मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह न्यायसंगत समझता है तो, वह विवाह विच्छेद की डिक्री के बजाय न्यायिक पृथक्करण के लिए डिक्री पारित कर सकेगा ।

  1. इसके अवाला इसमे दोनों पक्षों के एफिडेविट भी होते है | जो की, आवेदनों के कथनों को सत्य है ये कहते है | इसके अलावा लिखा होता है की दोनों पक्ष बिना किसी दबाव के आपसी सहमती से तलाक ले रहे है इनमे आपस में रहने का कोई समझोता नही हो सका है |
  2. अगर कोई शर्त या लेन- देन होती है तो उसका विवरण होता है | ज्यादातर केसों में अग्रीमेंट बना कर उसकी कॉपी साथ लगा दी जाती है |
  3. डाक्यूमेंट्स की बात करे तो दोनों पक्षों के एक-एक पासपोर्ट साइज़ फोटो जो की आवेदन के पहले पेज पर लगते है , शादी का कार्ड या शादी की कोई फोटो, पहचान व पते के लिए आधार कार्ड या पहचान पत्र जिसमे वही पता हो जो की आवेदन में दिया है, अगर नही तो उसके लिए अलग से एफिडेविट इत्यादि |
  4. इसके अलावा जैसे की उपर विवरण दिया है अगर पति-पत्नी की शादी को एक साल नही हुआ है या फिर वो एक साल से अलग नही रह रहे है तो 1 साल के पर्थिकरण को समाप्त करने के लिए हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 14 में एप्लीकेशन जो की इस आवेदन के साथ लगा सकते है |
  5. कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलों को सुन कर दोनों की स्टेटमेंट को रिकॉर्ड करती है तथा दोनों पक्षों के हस्ताक्षर अंगूठो के निशान के साथ लिए जाते है | ताकि कोई बाद में मुकर नही सके | तथा दोनो पक्षों को उनके वकील साहब identified करते है की ये दोनों वही, सही व्यक्ति, यानि पति-पत्नी है |

2. दूसरा चरण second motion :-

दूसरा आवेदन यानि (second motion) हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 B (2) के अंतर्गत किया जाता है | जिसमे दुबारा से शादी से पहले व बाद का नाम, पता, उम्र व शादी का स्टेट्स लिखा होता है | इसके अलावा फर्स्ट मोशन हो चुका है इसका विवरण होता है |

हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 B (2) का हिंदी रूपांतरण निचे दिया है :-

13-ख. पारस्परिक सम्मति से विवाह-विच्छेद-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि विवाह के दोनों पक्षकार मिलकर विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा विवाह के विघटन के लिए अर्जी, चाहे ऐसा विवाह, विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् अनुष्ठापित किया गया हो, जिला न्यायालय में, इस आधार पर पेश कर सकेंगे कि वे एक वर्ष या उससे अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं और वे एक साथ नहीं रह सके हैं तथा वे इस बात के लिए परस्पर सहमत हो गए हैं कि विवाह का विघटन कर दिया जाना चाहिए।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अर्जी के पेश किए जाने की तारीख से छह मास के पश्चात् और उस तारीख से अठारह मास के पूर्व दोनों पक्षकारों द्वारा किए गए प्रस्ताव पर, यदि इस बीच अर्जी वापस नहीं ले ली गई है तो, न्यायालय पक्षकारों को सुनने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, अपना यह समाधान कर लेने पर कि विवाह अनुष्ठापित हुआ है और अर्जी में किए गए प्रकथन सही हैं, यह घोषणा करते हुए विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करेगा कि विवाह डिक्री की तारीख से विघटित हो जाएगा ।

  1. अगर डाक्यूमेंट्स की बात करे तो दुबारा से दोनों पक्षों के एक एक पासपोर्ट साइज़ फोटो आवेदन के पहले पेज पर , शादी का कार्ड या शादी का फोटो , आधार कार्ड या पहचान पत्र लगाया जाता है तथा साथ में पहले आवेदन (first motion) के आदेश की सर्टिफाइड कॉपी भी लगाई जाती है |
  2. वैसे तो  दूसरा आवेदन (second motion) हमें पहले आवेदन (first motion) के आदेश के पारित होने से 6 महीने बाद कभी भी कर सकते है  | लेकिन ये आवेदन 18 महीने पुरे होने से पहले करना होता है | इसमें कोर्ट के पहले आवेदन के आदेश (first motion) की सर्टिफाइड कॉपी लेने के समय को नही गिना जाता है | लेकिन अगर हम आवेदन के लिए 6 महीने का इन्तजार नही करना चाहते है तो इसके लिए लेकिन आप CPC की धारा 151 में एप्लीकेशन लगा कर  इस 6 महीने की समय सीमा को समाप्त करवा सकते है | ये एप्लीकेशन दूसरे आवेदन यानि (second motion)  के साथ जाती है |
  3. इसमें भी कोर्ट वही दोनों पक्षों की दलीलों को सुन कर दोनों की स्टेटमेंट को रिकॉर्ड करती है वकील साहब दोनों पक्षों को identified करते है और कोर्ट तलाक की दो डिग्रीया इशु करती है जो की दोनो पक्षों को एक-एक ओरिजिनल डिग्री मिलती है | आप इस डिग्री की और भी सर्टिफाइड कॉपी कोर्ट में आवेदन करके ले सकते है |

आपसी सहमती से तलाक लेने के दौरान ध्यान देने योग्य कुछ गंभीर बातें :-

1. आप अपने वकील वकील साहब के द्वारा एक settlement deed अर्थात समझौता डीड (MOU) बनवा ले जिसमे समझोते की सभी बातें लिखी हो :-

2. जैसे की तलाक के बाद यदि बच्चा है तो उसकी custody किसके पास रहेगी ?

3. पति द्वारा दी जाने वाली एकमुश्त राशि, कितनी होगी, कब और कैसे उसकी पेमेंट की जायेगी ?

4. यदि दोनों पक्षों के बीच केस चल रहे हैं जैसे दहेज़, खर्चे यानी maintenance धारा 125 CRPC का, या domestic violence यानी घरेलु हिंसा का तो उनको कब और कैसे withdraw करना है ?

5. अगर पति और उसके अन्य घरवालों के खिलाफ कोई FIR धारा 498A /406 IPC में रजिस्टर्ड है तो उसे कैसे और कब हाई कोर्ट से खत्म (quash) करना है ?

6. यदि कोई प्रॉपर्टी हैं तो, उनका distribution कैसे किया जाएगा ? पत्नी को कितनी प्रॉपर्टी दी जाएगी ?

7. पत्नी को उसका स्त्रीधन वापिस किया गया है या नहीं अगर करना है तो कब और कैसे ?

8. कोर्ट के खर्चो से सम्बन्धित जैसे FIR धारा 498A /406 IPC के केस को ख़त्म (quash) करवाना और आपसी सहमती से तलाक का खर्चा कौन उठाएगा ?

9. भविष्य में maintenance या कोई और क्लेम किया जा सकता है या नहीं ? अगर भविष्य में कोई क्लेम देना है या निरंतर पति को पत्नी को मेंटेनेंस देना है तो उसका जिक्र की कब और कैसे ? ऐसी और भी बहुत सी बातें हैं ? उपरोक्त सभी बातों का settlement deed में उल्लेख करना बहुत जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी भी पक्ष को किसी भी तरह की परेशानी का सामना ना करना पड़े |

10. सब पैसो या कीमती समान, जेवर का लेन देन कोर्ट के सामने ही करे |

11. हो सके तो आपसी समझोते से तलाक स्वय ना ले कर आप किसी अच्छे वकील साहब के द्वारा ही ले ताकि आपको किसी परेशानी का सामना नही करना पड़े |

अगर पत्नी first motion में पैसा ले कर second motion में नही आये या फिर sign करने से इनकार कर दे तो क्या करे :-

अगर आपका समझोता (MOU) लिखित में हुआ है और पत्नी first motion में पैसा ले कर second motion में नही आये तो आप second motion  हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 B (2) के अंतर्गत फाइल करे और आपनी पत्नी को कोर्ट के द्वारा नोटिस पहुचाये | तब आपकी पत्नी को कोर्ट में sign करने के लिए आना पडेगा | अगर वो नही आती है तो आप सिविल कोर्ट में अपनी पत्नी के खिलाफ रिकवरी का केस फाइल करके अपना पैसा और कीमती समान वापस ले सकते है |

क्या तलाक के बाद दोनों पक्ष शादी कर सकते है या फिर इस आपसी सहमती के तलाक को खत्म भी कर सकते है :-

जी हां अगर पति- पत्नी तलाक होने के बाद दुबारा पति-पत्नी की तरह रहना चाहते है तो हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 10 के अनुसार कोर्ट में आवेदन करके वे अपनी तलाक की डिग्री को खत्म करवा सकते है |

आपसी सहमति से तलाक के फायदे :-

तलाक के आवेदनों की संख्या को बढ़ते देख और जल्दी तलाक के लिए मांग बढ़ रही है, आपसी सहमति से तलाक सबसे अच्छा विकल्प है ।

  • आपसी सहमति से तलाक दोनों पार्टियों के लिए समय, धन और ऊर्जा की बचत होती है |
  • अनावश्यक झगड़ा के लिए कोई गुंजाइश नहीं होती
  • और सबसे महत्वपूर्ण बात आप सार्वजनिक रूप से बेइज्जत होने या फिर समाज में एक दुसरे पर गंदे आरोप लगाने से बच जाते है |

जय हिन्द

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द्वारा

अधिवक्ता धीरज कुमार

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