लीगल नोटिस क्या होता है ?, ये कैसे बनाना चाहिए ?

प्रशन :- वकील साहब, लीगल नोटिस क्या होता है ?, ये कैसे बनाना चाहिए ? इसको भेजने की क्या समय सीमा है ? इसे भेजने में कौन सी सावधानियां बरते ? इसके क्या लाभ है ? हम स्वय कैसे लीगल नोटिस भेज सकते है?

उत्तर :- लीगल नोटिस क्या होता है

लीगल नोटिस का अर्थ है, विरोधी पार्टी को किसी भी प्रकार के क्लेम, चेतावनी या फिर अपनी इच्छा अनुसार कोई शर्त मानने की, एक प्रकार के क़ानूनी धमकी,

की अगर उसने आपकी इच्छा अनुसार आपका कहा नही किया तो आप उस के खिलाफ क़ानूनी कार्यवाही कर देंगे इसलिए वो आपकी शर्तो को मान ले दुसरे शब्दों में हम इसे सिविल थ्रेट भी कह सकते है  |

लीगल नोटिस में हम अपने प्रतिद्वंदी को ये बताते है की उसने हमारे देश के कानून का उलहंगन किया है और वो कैसे किया है और उससे हमे क्या नुक्सान हुआ है या फिर हो सकता है और अपनी उस गलती को सुधरने के लिए उसे हमारी शर्ते माननी होगी जो की उस नोटिस में लिखी जाती है तथा उन् शर्तो को मानने की समय सीमा भी लिखी जाती है की अगर इस दिए समय में आपकी शर्तो के अनुसार कार्य नही किया तो आप क़ानूनी कार्यवाही कर देंगे | और दी गई समय सीमा के बाद आप क़ानूनी कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होते है |

जाने लीगल नोटिस क्या होता है ?

लीगल नोटिस कब, किसको और क्यों भेजना चाहिए ? :-

जब भी आपको लगे की किसी ने आपके साथ गलत किया है आप उसे लीगल नोटिस भेज सकते है किसी भी प्रकार के सिविल रॉंग के लिए आपको पहले लीगल नोटिस भेजना जरूरी होता है जैसे की आप को किसी से बकाया पैसा लेना है या फिर किसी ने आपका कोई नुकशान कर दिया है या फिर आपका चेक बोउन्स हो गया है या आपको किसी ने अवमानना यानि बेज्यती की है इसमें आप पहले लीगल नोटिस भेजते है |

पर इसके अलावा आप किसी भी व्यक्ति, समूह कम्पनी, समिति, सरकारी या गैर सरकारी विभाग को लीगल नोटिस किसी भी बात के लिए भेज सकते है लेकिन इसके लिए जरुर है की आप उस व्यक्ति या संस्था से प्रभावित हुए हो या हो सकते हो फिर आप उसे अपनी शर्तो पर कार्यवाही करने के लिए कहते है

कुछ क़ानूनी कार्यवाही के लिए तो लीगल नोटिस जरुरी होते है जैसे की चेक बोउन्स केस, सिविल सूट और अवमानना के केस इत्यादि |

लीगल नोटिस को कैसे ड्राफ्ट करे ?

लीगल नोटिस कोई छोटी चीज नही है,  इसे  बहुत ही सावधानी से बनाया जाना चाहिए, क्योकि आप कोर्ट में कोई भी केस फाइल कर के उसे वापस ले सकते है या फिर उस केस में कोई भी बदलाव करके दुबारा भी फाइल कर सकते है लेकिन लीगल नोटिस एक बार भेजने के बाद आप इसमें कोई भी बदलाव नही कर सकते है | फिर उस गलती का कोई इलाज नही है इसलिए लीगल नोटिस को आसान सा काम समझ कर नही भिजवाये उसे किसी अच्छे वकील साहब से ही बनवाये | आइये जाने की लीगल नोटिस कैसे बनाना चाहिए :-

  1. सबसे उपर डेट लिखे | फिर आप जिसे लीगल नोटिस भेज रहे है उसका पूरा नाम व पता लिखे अगर वे एक से ज्यादा है तो उन्हें सिरिअल नंबर दे कर सम्बोधन करे | अगर वे व्यक्ति किसी कम्पनी या संस्था में कार्यरत है तो उनके नाम का विवरण उनकी पोस्ट के साथ दे | तथा कंपनी को भी सिर्फ नाम से पार्टी जरुर बनाये |
  2. फिर सब्जेक्ट की जगह आप लीगल नोटिस का टाइटल लिखे, ताकि पता चल सके की आप उस व्यक्ति को लीगल नोटिस ही भेज रहे है, कोई पत्र नही
  3. फिर आप वो लीगल नोटिस किस मोड़ से भेज रहे है उसका विवरण करे जैसे की स्पीड पोस्ट, रजिस्टर्ड या कुरियर इत्यादि |
  4. फिर अपना पूरा नाम व पता लिखने के बाद आप उस व्यक्ति, व्यक्तियों, संस्था को सम्बोधित करे, आप को जो बात कहनी है उसे साफ स्पस्ट रूप से कम शब्दों में ज्यादा बात लिखे | आपके साथ जो उन्होंने गलत किया है या हो सकता है  उसका विवरण दे | अगर हो सके तो समय, दिनाक व जगह के साथ विवरण लिखे 
  5. फिर विरोधी पार्टी को जो डायरेक्शन या शर्त आपको रखनी है और पालन करवाना है उसका विवरण दे अगर लीगल नोटिस चेक बोउन्स से सम्बन्धित है तो उसमे चेक का पूरा बोयरा दे की वो चेक कैसे कब और किस कारण से बोउंस हुआ था तथा उससे अपनी पेमेंट देने व लेने की बात भी कहे | अगर जमीन से सम्बन्धित है तो जमीन का ब्यौरा दे कर उस के बारे में गलत हुआ वो लिखे
  6. तथा अंत में अपनी शर्तो और बातो को मानने की समय सीमा का भी विवरण दे वैसे सामान्य क़ानूनी रूप से समय सीमा 15 दिन होती है | लेकिन आपका केस अगर चेक से सम्बन्धित नही है और ज्यादा समय देने में आपको भारी नुकशान का सामना करना पड रहा है तो आप समय सीमा को घटा कर 7 दिन भी कर सकते है | (चेक बोउन्सिंग के केसों में लीगल नोटिस में सामने वाली पार्टी को पैसे देने की समय सीमा 15 दिन तय की गई है)
  7. आप चाहे तो सामने वाली पार्टी को समय पर अपनी शर्तो के अनुसार कार्य नहीं करने पर नुकसान भरने के लिए राशी भी बता सकते है तथा कोर्ट में जाने की बात तो कहते ही है
  8. अंत में भेजने वाला लीगल नोटिस के हर पेज पर अपने हस्ताक्षर करे, साथ ही इसे पेजेज भी करे
  9. लीगल नोटिस में पार्टी को नोटिसी कह कर सम्बोधिक किया जाता है तो इस नियम का पालन करे | उन्हें नाम की बजाये नोटिसी कहे तथा एक से ज्यादा पार्टी होने पर उन्हें नाम की जगह अपने द्वारा दिए गए सिरिअल नंबर से सम्बोधित करे जैसे नोटिसी नम्बर 1 या नोटिसी नम्बर 2
  1. नोटिस जिसने भेजा है जैसे की वकील साहब भेजते है तो उन्ही को एड्रेस करते हुए उन्ही के नाम से नोटिस का जवाब दे तथा सबसे पहले उनका नाम व ऑफिस का पता लिखे
  2. नोटिस किस दिनाक का बना है उसका विविरण देते हुए उसके जवाब का टाइटल लिखे जैसे की “रिप्लाई ऑफ़ लीगल नोटिस डेटेड ……”
  3. नोटिस में वकील साहब के क्लाइंट और अपनी विरोधी पार्टी को आप उनके क्लाइंट है ये कहकर सम्बोधित करे
  4. सबसे पहले जवाब में विरोधी पार्टी के वकील साहब को कहे की आपके क्लाइंट ने आपको धोखे में रख कर ये काम करवाया है आप पुरे केस के फैक्ट्स से अनजान है इसलिए आपने मुझे ये गलत लीगल नोटिस भेजा है
  5. बाद में अपना पक्ष रखते हुए पूरी बात लिखे की असली कहानी क्या है |
  6. इसके बाद मिले हुए नोटिस के पारा नम्बर के हिसाब से उसका जवाब दे | हर जवाब स्टिक होना चाहिये
  7. बाद में आप भी कानून की धमकी दे सकते है तथा जो आपको अपनी शर्त लिखनी है वो भी आप उसमे लिखे
  8.  अगर जवाब वकील साहब दे रहे है तो इस लीगल नोटिस के जवाब की भी फीस की भी डिमांड विरोधी पार्टी से करे | अगर आप स्वय दे रहे है तो भी ऐसा कर सकते है  
  9. नोटिस के सभी पेजों पर अपने हस्ताक्षर करे, डेट डाले तथा पेजेज भी करे
  10. वैसे मेरे हिसाब से बहुत जरुरी हो तो लीगल नोटिस का जवाब देना चाहिए वरना हमेशा जवाब देने से बचना चाहिये | क्योकि नोटिस का जवाब देने से सामने वाली पार्टी को आपके केस के फैक्ट्स और आपके डिफेंस का पता चल जाता है की आप कोर्ट में उसके केस करने के बाद अपना क्या डिफेंस लेंगे | ऐसे में वो पार्टी उन कमियों को भी पूरा करके केस को फाइल करती है | दूसरा नुकशान ये की आप कोर्ट में जाकर फिर अपना डिफेंस बदल भी नही सकते है क्योकि सामनेवाली पार्टी के पास आपके लीगल नोटिस का जवाब सबूत के तौर पर होता है |इसलिए हो सके तो लीगल नोटिस का जवाब देने से बचे |

लीगल नोटिस रिसीव करे या नही :-

बहुत सारे लोग इसी उधेड़ बन का शिकार होते है की वे लीगल नोटिस ले या नही | आइये इसके बारे में जाने :- वैसे तो कोई भी लीगल पेपर आप के पास आये तो वो लेना चाहिए, ताकि आपको पता चल सके की क्याआपके खिलाफ क्या हो रहा है कई बार आप नोटिस लेने से मना कर देते है तो उसकी ये रिपोर्ट को जब कोर्ट में जाती है तो “कोर्ट लेने से मना करना”  आप को लीगल नोटिस रिसीव ही समझता है तथा आपके खिलाफ केस स्वीकार कर लेता है | इसलिए नोटिस को जरुर रिसीव करे |

लेकिन कुछ लीगल नोटिस रिसीव ही नही करे तो अच्छा है जैसे की चेक से सम्बन्धित लीगल नोटिसो को नही लेने में फायदा होता है अगर हो सके तो आप ये रिपोर्ट बनवा के भिजवा दे की पता गलत है तो वो रिसीव नही माना जाएगा | ऐसे बार केस ही रजिस्टर्ड नही होता है या फिर आप इस आधार पर केस भी जीत सकते है | आपके चेक बोउन्स होने के एक महीने के अंदर ही लीगल नोटिस आपके पास आता है | इसलिए आप उसके लिए पहले से ही सतर्क भी हो सकते है

कौन से सिविल केस हम बिना लीगल नोटिस के फाइल कर सकते है :-

वैसे तो लीगल नोटिस सिर्फ सिविल केसों में ही दिया जाता है लेकिन कई केस ऐसे भी है जिनमे किसी भी लीगल नोटिस की जरूरत नही होती है जैसे की कोई आप की जमीन पर या किसी सरकारी जगह पर कब्जा कर चुका है, या  करने वाला है या फिर कोई बिना मुन्सिपल डिपार्टमेंट / सरकारी विभागों की पेर्मिसन से गैर क़ानूनी कन्ट्रसन/निर्माण कर रहा है या करने वाला है उसे रोकने के लिये आप बिना उस आदमी और किसी भी सरकारी डिपार्टमेंट को लीगल नोटिस दिये बगैर, सीधे कोर्ट में केस कर सकते है तथा कोर्ट से उस काम या जगह पर स्टे भी ले सकते है |

क्रिमिनल केसों में लीगल नोटिस की आवशयकता  :-

वैसे क्रिमिनल केसों में सिर्फ डिफेमेशन यानी अवमानना के केसों को छोड़ कर किसी भी प्रकार के लीगल नोटिस की कोई आवशयकता नही होती है क्योकि क्राइम हमेशा आपके साथ-साथ हमारे देश की संप्रभुता के खिलाफ भी होता है  इसलिए स्टेट उस केस को अपराधी के खिलाफ लडती है तथा सजा दिलवाती है स्टेट की तरफ से सरकारी वकील लड़ता है लेकिन आप चाहे तो कोई क्रिमिनल एक्टिविटी होने से पहले विरोधी पार्टी को लीगल नोटिस दे सकते है | इससे लाभ ये है की आपका पक्ष मजबूत होता है

लीगल नोटिस भेजने की समय सीमा क्या होती है ? :-

इसके लिए वैसे तो हर क़ानूनी कार्य के लिए समय सीमा होती है जैसे की चेक बोउन्सिंग केस में हमे चेक बोउन्स स्लिप बैंक से मिलने के 30 दिनों के अंदर लीगल नोटिस भेजना होता है लेकिन कई क़ानूनी चीजे ऐसी है जो की जब आप की जानकारी में आती है तब से ही उनकी टाइम लिमिट शुरू होती है और वो अगले 3 साल तक रहती है | जैसे की आपके साथ किसी व्यक्ति ने या संस्था ने गलत किया है या आपका नुकसान किया है और आप को जब इसके बारे में पता चला, तब ही आपने इसके लिए लीगल नोटिस की या अन्य क़ानूनी कार्यवाही करने की समय सीमा शुउसी समय से शुरू होती है

लीगल नोटिस भेजने के लाभ :-

  1. जैसे आप किसी को लीगल नोटिस भेज रहे है वो उस से डर कर या फिर क़ानूनी कार्यवाही से बचने के लिए आपकी शर्तो के अनुसार आपकी बात मान ले और इस कारण आप भी क़ानूनी प्रकिर्या के खर्चो से बच जाते है
  2. बात बनने पर आप व सामने विरोधी पार्टी दोनों ही लम्बी समय तक परेशान होने वाली क़ानूनी पर्किर्या से भी बच सकते है |
  3. कोर्ट में केस लम्बा चलने के कारण आपसी दुश्मनी भी बढती है | अगर लीगल नोटिस से ही बात खत्म होती है तो ज्यादा अच्छा है
  4. आपके ज्यादातर केस तो लीगल नोटिस भेजने के बाद भी शॉट आउट हो जाते हैं । जैसे कि, आपको किसी से पैसा लेना है, और आप जैसे ही उसको लीगल नोटिस भेजते हैं और वो व्यक्ति आप को आपका वह पैसा लौटा देता है, तो आप क़ानूनी कार्यवाही करने से बच जाते है तथा सामने वाली पार्टी भी कोर्ट में खर्च होने वाले समय व पैसो से बच जाती है
  5. लीगल नोटिस भेजने का मतलब ये होता है की आप ने वकील साहब को अपोइन्ट किया है तथा बात नही मानने पर वो आप पर केस भी करेगा | ऐसे में इस बात से आश्वस्त हो कर की आप केस करोगे और सामने वाली पार्टी का केस कमजोर हो तो भी वो आपकी शर्तो को मानकर, समझोता करके आपकी बात मान लेती है तथा क़ानूनी कार्यवाही से बच जाती है
  6. कई बार सरकारी कर्मचारी भी लीगल नोटिस के डर से आप की बात मान मानकर आपका रुका हुआ काम कर देते है क्योकि केस करने पर उन्हें अपनी नौकरी पर आंच आने का डर होता है | और कहावत भी है की मार से ज्यादा मार का डर होता है ये कहावत यहा बिलकुल सही बैठती है

लीगल नोटिस भेजने में क्या सावधानिया बरते :-

जैसे की पहले बताया है की लीगल नोटिस कोई छोटी चीज नही है क्योकि हम कोर्ट में केस करके बदलाव कर सकते है पर लीगल नोटिस में नही इसलिए लीगल नोटिस बहुत सावधानी से भेजे और इसमें निम्नलिखित सावधानिया बरते

  1. याद रहे अगर आपका डिस्पुट किसी कंपनी या संस्था के साथ है तो उस के उन एम्प्लोयी को तो पार्टी बनाये ही साथ ही कम्पनी को जरुर, सिर्फ उसके नाम से पार्टी बनाये | कई बार वकील साहब भी गलती कर जाते है की कंपनी को किसी डायरेक्टर के द्वारा वो भी नाम से पार्टी बना देते है जो की गलत है उसमे सिर्फ वो डायरेक्टर ही ही कम्पनी के द्वारा पार्टी होता है | कम्पनी नही | ऐसे में कोर्ट उन केसों को स्वीकार नही करती है और क्लाइंट का बहुत बड़ा नुकशान हो जाता है | कम्पनी या संस्था स्वय में एक व्यक्ति है इसलिए ऐसे केसों में कोर्ट द्वारा परेशानी से बचने के लिए सीधे ही पहली पार्टी कम्पनी को ही बनाये, कम्पनी या संस्था स्वय भी बिना किसी डायरेक्टर के पार्टी बन सकती है, इसलिए हमेशा पहली पार्टी कम्पनी/संस्था को सिर्फ उसके नाम से ही बनाये | इसमें ये फायदा है की कल को कोई डायरेक्टर बदल जाता है या मर भी जाता है तो कंपनी की लायबिलिटी तो हमेशा रहती है
  2. लीगल नोटिस साफ कागज पर लिखा हो, जिसकी भाषा साफ व स्पस्ट हो, जिसका मतलब आसानी से समझ में आ जाए | कभी भी लीगल नोटिस ऐसी भाषा में नही लिखे की उस बात का कोई दूसरा मतलब भी निकल सके और आप अपनी गलती के कारण ही केस हार जाये | जैसे की चेक बोउन्स केस में आप सामने वाली पार्टी को 15 से कम दिनों का समय पैसे लोटने के लिए कहो, या फिर अपने होने वाले या किये गये नुकसान का विवरण अधूरा दो और बाद में केस में डिटेल में लिखो तो वो आपके खिलाफ ही जाता है इसके अलावा आप लीगल नोटिस में पैसो की डिमांड या छतिपूर्ति कम लिखो तथा बाद में केस में ज्यादा लिखो तो वो गलत हो जाता है तथा आप केस हार जाते हो इत्यादि |
  3. लीगल नोटिस में आप छतिपूर्ति कितनी चाहिये इसका सही प्रकार से विवरण दे क्योकि आप इसको बाद में कम या ज्यादा नही कर सकते है जितनी छतिपूर्ति आपने अब लिखी है आप को उस समय तक के लिए उतनी ही लिखनी होगी वर्ना आप इसी आधार पर केस हार जायेंगे | इसके अलावा आप को अगर अब भी कोई नुकसान लगातार हो रहा है तो उसका भी विवरण दे |
  4. कई बार लीगल नोटिस में नुकशान और भविष्य के लिए छतिपूर्ति कम लिखी जाती है तथा बाद में पता चलता है की ज्यादा होनी चाहिए थी | ऐसे में आप केस के प्रेयर में लिखे की नोटिस भेजने के बाद आपको उस बात से और भी जो नुकसान  “जो आप दिखा सको वो हुआ था उसका विविरण दे”  तथा उस से भविष्य में अब इतनी और छति हो सकती है उसका भी विवरण दे | इस प्रकार से नोटिस में दी गई छतिपूर्ति व नुकसान का विविरण प्रेयर में  दे कर आप बाकी अलग से बड़ी हुई छतिपूर्ति व नुकसान का विवरण देकर, अपनी प्रेयर लिखे | इससे फायदा ये है की आपकी बड़ी हुई छतिपूर्ति राशी भी कोर्ट के रिकॉर्ड पर आ जाती है जो आपको केस जितने पर मिलेगी तथा इस प्रकार से लिखने पर विरोधी पार्टी भी इस पर कोई ऑब्जेक्शन नही उठा सकेगी |
  5. लीगल नोटिस में हमेशा सामने वाले की गलतिया गिनाई जाती है तथा उसे बात नही मानने पर कोर्ट जाने की धमकी भी दी जाती है | ये सब बाते क़ानूनी भाषा में लिखी हो, धमकी भी क़ानूनी भाषा में हो ताकि दुसरे को समझ भी आ जाए और वो आप पर डीफेमेसन का केस या कोई गलत बात कहने का दोष भी नही लगा सके | अगर दुसरे शब्दों में कहे तो बिना गाली दिए अपने विरोधी को सभ्य भाषा में गुस्से से डाटना |
  6. लीगल नोटिस में हमेशा सच बात या केस के अनुसार क़ानूनी रूप से जो हो सके वो ही बात लिखे कभी भी झूठे बिना सर पैर के आरोप नही लगाये और ना ही कोई बात हवा में कहे | “आरोप सीधे सच्चे या फिर केस के अनुसार जो की साबित हो सके या फिर सच लगे या फिर सच जैसे दिखे, ऐसे होने चाहिए” |
  7. लीगल नोटिस के हर पेज पर हस्ताक्षर व पेजिंग होनी चाहिए ताकि सामने वाली पार्टी किसी भी प्रकार का धोखा करके आपका लीगल नोटिस बदल कर कोर्ट में पेश नही कर पाए | क्योकि कई बार ऐसा होता है की क्लाइंट लीगल नोटिस किसी और वकील साहब से भिजवाता है और केस किसी दुसरे वकील साहब से डलवाता है तथा कई बार वकील साहब से फ़ीस का डिसपुट होने के कारण उस नोटिस की कॉपी भी नही ले पता है | जिसे के कारण कभी-कभार कोई धूर्त विरोधी पार्टी, कोर्ट को भी धोका देकर बदला हुआ लीगल नोटिस पेश कर देती है और केस जीत जाती है वैसे ऐसा होने के चांस कम ही होते है और ऐसा काफी सालो  पहले होता था लेकिन आप फिर भी सावधानी रखे | रिस्क नही ले |
  8. लीगल नोटिस में अपनी शर्तो को पूरा करने की समय सीमा का जिक्र जरुर करे जैसे की चेक बोउन्स के केसों में ये 15 दिन ही होती है तथा बाकी केसों में ये आप के द्वारा कम या ज्यादा भी की जा सकती है जो की 7 दिन से 1 महीना भी तक हो सकती है | लेकिन आप इससे ज्यादा या कम नही करे | ज्यादा समय देने से विरोधी पार्टी को सोचने और आपके खिलाफ कोई षड्यंत्र रचने का समय मिल जाता है
  9. हमेशा लीगल नोटिस भेजने की प्रति सम्भाल आकर रखे तथा उसकी डिलवरी रिपोर्ट समय पर ले और कोर्ट में लगाये | क्योकि कई बार लीगल नोट्स भेजने की स्लिप गुम हो जाने की दशा में या फिर वकील साहब से फीस डिसपुट के कारण वो नही मिल पाती है और आप केस भी फाइल नही कर पाते है |
  10. हमेशा लीगल नोटिस विरोधी पार्टी को डिलीवर भी होना जरूरी होता है | क्योकि इसी के आधार पर केस कोर्ट में स्वीकार होते है | इसलिए लीगल नोटिस पर भेजने के तीनो मोड़ (स्पीड पोस्ट, रजिस्टर पोस्ट और कुरयर) में से सबसे पहले सरकारी मोड़ स्पीड पोस्ट से भेजे क्योकि ये सबसे जल्दी पहुचता है अगर ये आपके दिए पते पर पहुच जाता है तो ठीक है वरना दुसरे पोस्ट से भेजते समय आप डिलीवरी बॉय से सेटिंग कर ले और उसे डिलीवर या फिर जानकर कर लोटाया ऐसा लिखाये | इसमें कोई गलत नही है क्योकि “सतर्कता, चालाकी, समय पर सही निर्णय, धोखे का जवाब धोखा ही, लीगल परक्टिस का सबसे बड़ा हिस्सा है” | जो इसे स्वीकार नही करता वो कभी भी बड़ा वकील नही बन सकता |
  11. लीगल नोटिस की हमेशा ओरिजिनल प्रति ही सामने वाली पार्टी को भेजे तथा उसकी फोटो कॉपी अपने पास रखे और कोर्ट में लगाये | एक के ज्यादा एड्रेस या पार्टी होने के स्तिथि में मेन पार्टी को असली प्रति भेज कर बाकी पार्टियों को उसकी फोटो कॉपी ही भेजे तथा उस प्रति पर कॉपी भी लिख दे |
  12. हमेशा लीगल नोटिस स्वय नही भेज कर किसी काबिल वकील साहब से ही भिजवाए क्योकि आप के स्वय भेजने में अगर कोई गलती हो गई तो उसे दुबारा कभी भी सुधारा नही जा सकता है | और वकील साहब तो छोटी-छोटी बातो को भी पकड कर बड़ी दिखा कर केस का रुख बदल देते है  

स्वय लीगल नोटिस कैसे भेजे :-

आप स्वय लीगल नोटिस ही नही अपना केस भी लड़ सकते है कानून में ऐसा कोई प्रावधान नही है जो की आपको किसी भी प्रकार की ऐसी कार्यवाही करने से रोके | लेकिन जैसे की मैंने पहले बताया है की ये कोई छोटा काम नही है बहुत ही सावधानी से करने वाला काम है तो इसे हो सके तो किसी अच्छे वकील साहब से ही करवाये | लेकिन फिर भी आप स्वय इसे भेजना चाहते है तो जरुर भेजे तथा उपर दी गई सावधानियो का ध्यान रखे |

लीगल नोटिस की फीस कितनी होनि चाहिये :-

वैसे तो हम वकीलों के कोई फीस फिक्स नही होती है हम लोग केस पर मेहनत के अनुसार ही फीस लेते है | लेकिन राज्यों के अनुसार ये कम ज्यादा भी हो सकती है | जैसे दिल्ली जैसे शहर में सबसे ज्यादा महंगी फीस है | लेकिन सामान्य रूप से किसी भी लीगल नोटिस की फीस 1100 रुपये से 21 हजार रुपये तक हो सकती है |  चेक बोउन्सिंग केसों की 1100 रुपये से 5100 रुपये तक ही | वो भी आपके चेको के अमाउंट के अनुसार |

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.

द्वारा

अधिवक्ता धीरज कुमार

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