घरेलू हिंसा domestic violence कानुन क्या है

प्रशन :- वकील साहब ये घरेलू हिंसा domestic violence कानुन 2005 क्या है ये कितने प्रकार का होता है इसमे महिला को किस प्रकार से राहत मिल सकती है क्रप्या इसके बारे में बताये |

उत्तर :- 

हम आए दिन समाज में स्त्री जाति पर होने वाले अत्याचारों के वाकए टीवी चैनलों से लेकर अखबारों में हम पढ़ते ही रहते हैं. दिल्ली स्थित एक सामाजिक संस्था द्वारा कराए गए अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग पांच करोड़ महिलाओं को अपने घर में ही हिंसा का सामना करना पड़ता है. इनमें से मात्र 0.1 प्रतिशत ही हिंसा के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने आगे आती हैं. आश्चर्य तो इस बात का है कि भारत में आज भी ज्यादातर महिलाएं इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि उन्हें घरेलू हिंसा से बचाने के लिए सरकार ने घरेलू हिंसा अधिनियम बनाया गया है. यही वजह है कि इस अधिकार के बारे में जानकारी न होने के चलते पीडि़ताओं की संख्या में इजाफा हो रहा है. आइए जानते हैं कि क्या है घरेलू हिंसा domestic violence कानुन

क्या है घरेलू हिंसा domestic violence कानुन ?

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन क्या है

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन क्या है

भारत में जो महिलाएं कुटुंब में रहती हैं तथा जिनके प्रति हिंसा होती है उनकी सुरक्षा तथा संरक्षण की गारंटी संविधान के द्वारा प्रदत्त है फिर भी संविधान द्वारा गारंटीयुक्त अधिकारों को अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने के उद्देश्य से गारंटी को सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2005 में भारतीय संसद ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 पारित किया. इस अधिनियम को 13 सितंबर 2005 के दिन राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई. भारत के राजपत्र में प्रकाशन के पश्चात 14 सितंबर, 2005 से यह अधिनियम प्रभावी हो गया.

यह अधिनियम महिला बाल विकास द्वारा ही संचालित किया जाता है. शहर में महिला बाल विकास द्वारा जोन के अनुसार आठ संरक्षण अधिकारी नियुक्त किए गए हैं. जो घरेलू हिंसा से पीडि़त महिलाओं की शिकायत सुनते हैं और पूरी जांच पड़ताल करने के बाद प्रकरण को न्यायालय भेजा जाता है.

कानून ऐसी महिलाओं के लिए है जो कुटुंब के भीतर होने वाली किसी किस्म की हिंसा से पीडि़त हैं. इसमें अपशब्द कहे जाने, किसी प्रकार की रोक-टोक करने और मारपीट करना आदि प्रताडऩा के प्रकार शामिल हैं. इस अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं के हर रूप मां, भाभी, बहन, पत्नी व महिलाओं के हर रूप और किशोरियों से संबंधित प्रकरणों को शामिल किया जाता है. घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत प्रताडि़त महिला किसी भी वयस्क पुरुष (दोषी)को अभियोजित कर सकती है अर्थात उसके विरुद्ध प्रकरण दर्ज करा सकती है.

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन की परिभाषा:-

परिवार का कोई भी पुरुष सदस्य अगर महिला को मारता है, उसके साथ अभद्र भाषा में बात करता है या उसे किसी भी चीज के लिए विवश करता है तो वह महिला घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत उसके खिलाफ मामला दर्ज करा सकती है. व्यापक तौर पर घरेलू हिंसा के निम्नलिखित प्रकार है

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन के प्रकार :-

  1. शारिरिक हिंसा

मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात मारना मुक्का मारना, किसी अन्य रीति से शारीरिक पीड़ा या क्षति पहुंचाना.

  1. लैंगिक हिंसा

बलात्कार करना, अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, महिला के साथ दुव्र्यवहार करना, अपमानित करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना.

  1. मौखिक और भावनात्मक हिंसा

अपमान करना, चरित्र पर दोषारोपण करना, पुत्र न होने पर अपमानित करना, दहेज इत्यादि न लाने पर अपमानित करना, नौकरी न करने या उसे छोड़ देने के लिए विवश करना, विवाह न करने की इच्छा के विरुद्ध विवाह के लिए जबर्दस्ती करना, उसकी पसंद के व्यक्ति से विवाह न करने देना, किसी विशेष व्यक्ति से विवाह करने के लिए विवश करना, आत्महत्या करने की धमकी देना, कोई अन्य मौखिक दुर्व्यव्हार् करना.

  1. आर्थिक हिंसा

बच्चों की पढ़ाई और उनके संरक्षण के लिए धन उपलब्ध न कराना, बच्चों के लिए खाना, कपड़ा, दवाइयां उपलब्ध न कराना, रोजगार चलाने से रोकना या उसमें रुकावट पैदा करना, वेतन इत्यादि से प्राप्त महिला के आय को ले लेना, घर से निकलने के लिए विवश करना, निर्धारित वेतन या पारिश्रमिक न देना.

कैसे मिले राहत मिले  :-

इस अधिनियम घरेलू हिंसा domestic violence कानुन के अंतर्गत अगर कोई महिला घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराती है तो जिला मजिस्ट्रेट आरोपी को क्षति-पूर्ति करने का आदेश और सांझा घर के अंतर्गत निवास उपलब्ध कराने के आदेश जारी कर सकता है. अधिनियम की धारा 33 के अंतर्गत अगर आरोपी दिए गए आदेशों का पालन नहीं करता तो को एक वर्ष तक का दंड एवं बीस हजार तक का जुर्माना या दोनों का दंड दिया जा सकता है.

इस कानून के तहत घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए जज या अदालत तीन दिन के अंदर-अंदर बचावकारी आदेश एवं गिरफ्तारी के वारंट जारी करेंगे. घरेलू हिंसा से पीडि़त कोई भी महिला अदालत में जज के समक्ष स्वयं अथवा वकील, सेवा प्रदान करने वाली संस्था या संरक्षण अधिकारी की मदद से अपनी सुरक्षा के लिए बचावकारी आदेश ले सकती है. पीडि़त महिला के अलावा कोई भी पड़ोसी, परिवार का सदस्य, संस्थाएं या फिर खुद भी महिला की सहमति से अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में शिकायत दर्ज कराकर बचावकारी आदेश हासिल किया जा सकता है. घरेलू घटना रपट (डोमेस्ट्रिक इंसिडेंट रिपोर्ट) एक दफ्तरी प्रारूप है जिसमें घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करायी जाती है. इस कानून के तहत मिलने वाली राहत में बचावकारी आदेश, काउंसलिंग, क्षतिपूर्ति, भरण पोषण, बच्चों का संरक्षण और जरूरत पड़े तो रहने की जगह भी दी जाती है. अगर पीडि़त की रिपोर्ट से जज को ऐसा लगे कि पीडि़त को हिंसा कर्ता से आगे भी खतरा हो सकता है तो जज हिंसा कर्ता को घर से बाहर रहने के आदेश दे सकते हैं. इस कानून के अंतर्गत नियुक्त प्रोटेक्शन ऑफिसर (संरक्षण अधिकारी) की जिम्मेदारी यह है कि पीडि़त महिला को आवेदन लिखने में मदद करना, आवेदन जज तक पहुंचाना एवं कोर्ट से राहत दिलाना.

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन के तहत पीडि़ता किससे संपर्क करे :-

पीडि़त महिला घरेलू हिंसा से संबंधित अधिकारी जैसे उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास, बाल विकास परियोजना अधिकारी आदि से शिकायत दर्ज करा सकती है. किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संगठन से संपर्क किया जा सकता है जो महिलाओं और बच्चों के लिए काम करती हो. पुलिस स्टेशन से संपर्क कर सकती है. किसी भी सहयोगी के माध्यम से अथवा स्वयं जिला न्यायालय में प्रार्थना पत्र डाल सकती है. या फिर अपना अधिवक्ता करके कैस डाल सकती है |

घरेलू हिंसा के तहत महिला के अधिकार :-

इस अधिनियम को लागू करने की ज़िम्मेदारी पुलिस अधिकारी, संरक्षण अधिकारी, सेवा प्रदाता या मजिस्ट्रेट की होती है जो की महिला को उसके अधिकार दिलवाने में मदद करते है | महिला के अधिकार निमंलिखित है :-

  1. पीड़ित इस कानून के तहत किसी भी राहत के लिए आवेदन कर सकती है जैसे कि – संरक्षण आदेश,आर्थिक राहत,बच्चों के अस्थाई संरक्षण (कस्टडी) का आदेश,निवास आदेश या मुआवजे का आदेश
  2. पीड़ित आधिकारिक सेवा प्रदाताओं की सहायता ले सकती है
  3. पीड़ित संरक्षण अधिकारी से संपर्क कर सकती है
  4. पीड़ित निशुल्क क़ानूनी सहायता की मांग कर सकती है
  5. पीड़ित भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत क्रिमिनल याचिका भी दाखिल कर सकती है, इसके तहत प्रतिवादी को तीन साल तक की जेल हो सकती है, इसके तहत पीड़ित को गंभीर शोषण सिद्ध करने की आवश्यकताहैl

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन में कौन  शिकायत कर सकता है :-

इस अधिनियम के तहत कोई भी महिला जो की परिवार में रह रही है वो चाहे पत्नी हो या कोई लडकी इस अधिनियम के तहत अपने साथ रहने वाले व्यक्तियों के खिलाफ  शिकायत कर सकती है इस शिकायत में वो अपने साथ उस घर में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जो की पुरुष या नारी कोई भी हो की शिकायत करके केस में पार्टी बना सकती है |

क्या सास भी अपनी बहु पर केस कर सकती है :-

जी हा इस अधिनियम के तहत सास भी अपनी बहु (बेटे की पत्नी) के खिलाफ घरेलू हिंसा में केस कर सकती है वो इसमें अपनी बहु को सजा भी करवा सकती है इस केस में अगर सास के नाम वो मकान है तो वह अपनी बहु को कोर्ट के आदेश से उस घर से भी निकाल सकती है, सास चाहे तो अपने बेटे व उसके बच्चो के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करवा सकती है |

शिकायत कैसे करे :-

सबसे पहले ये जरूरी है की आप शिकायत कैसे करे क्योकि केस जितने के लिए सबके पहले केस का मजबूत होना जरूरी होता है |

  1. अपनी शिकायत साफ स्पस्ट और सीधे रूप में लिखे तथा घटनाओ का जिक्र एक रूपता में हो |
  2. आप पानी शिकायत धारा 12 के अंतर्गत करे तथा कोर्ट से और भी रिलीफ लेने के लिए बाकी धाराओं का भी उपयोग करे
  3. अगर आप अपने पीटीआई से खर्चा मांग रही है तो उसके सबूत जैसे की इनकम टैक्स की रसीद , वेतन की स्लिप या पास बुक की कॉपी जो भी ये साबित करे उसकी कॉपी या ओरिजनल कोर्ट के सामने पेश करे
  4. अगर कोई मारपिटाई आपके साथ हुई है तो उसकी मेडिकल रिपोर्ट
  5. इसके अलावा कोई और सबूत जैसे की कोई रिकोर्डिंग भी संकलन करे |

कोर्ट से क्या अपेक्छा कर सकते है :-

कोर्ट महिला की शिकायत पर संज्ञान लेकर उस पर कारवाही करता है वैसे तो शिकायत निपटने की समय सीमा 60 दिनों की होती है पर केसों की ज्यादता के कारण ये सम्भव नही होता है | लेकिन सबसे पहले कोर्ट महिला की अंतरिम एप्लीकेशन पर सुनवाई करती है जिसमे की महिला अपना खर्चा / मेंटेनेंस, दोषियों को  सजा  या बच्चे की कस्टडी की मांग कर सकती है |

महिला घरेलू हिंसा domestic violence कानुन का केस कैसे जीते :-

सबसे पहले ये जान ले ली आप के केस का आधर घरेलू हिंसा है अगर आप घरेलू हिंसा को ही साबित नही कर पाए तो आप बाकि की सुविधाए जैसे की मासिक खर्चे या बच्चे की कस्टडी को भूल जाये क्योकि इस केस के हारते ही ये सब चीजे भी खत्म हो जाएँगी | तो सबसे पहले किसी भी महिला के लिए इस केस में ये जरूरी है की वो कोर्ट में अपने खिलाफ हुई घरेलू हिंसा को साबित करे बाकि चीजे बाद में है इसके अलावा दूसरी बात ये है ये भी देखे की आप कोर्ट से प्रेयर में क्या मांग रही है  उन बातो का ध्यान रखे  :-

  1. केस में जो भी घटना लिखे उसको तारीख, महिना, या साल जो भी याद हो उसके साथ लिखे बिना किसी तारीख या साल के उस घटना का कोई वजूद नही रह जाता है वह झूटी घटना साबित होती है |
  2. महिला के लिए जरूरी है की अगर वो किसी भी प्रकार की शाररिक हिंसा जो की मारपिटाई से सम्बन्धित हो के आरोप लगाती है तो उसके लिए जरूरी है की वो अपनी मारपिटाई के मेडिकल बिल भी साथ में लगाये, अन्यथा वो मारपिटाई भी कोर्ट में झूटी साबित होगी
  3.  अगर महिला अपने पति से खर्चे की मांग करती है तो हो सके तो उसकी कमाई के सबूत भी कोर्ट में पेश करे इसमें इनकम टैक्स की स्लिप, अकाउंट की डिटेल, कोई सलेरी आती है तो उसकी कॉपी या डिटेल इसके अलावा कोई भी चीज जो आप के पति की इनकम को साबित करती हो | वैसे इनकम को साबित करना पति का ही काम होता है मगर आप भी अगर कोई ऐसा दस्तावेज कोर्ट के सामने दाखिल कर देते है तो आप अपने केस को मजबूत बनाते है
  4. जो भी आपने अपनी एप्लीकेशन में लिखा है उसको याद रखे व किसी अच्छे वकील साहब की मदद ले |

पति घरेलू हिंसा domestic violence कानुन का केस कैसे जीते :-

  1. पति को चहिये की वो अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता है तथा उसका बहुत ध्यान रखाता था उस बात के सबूत कोर्ट में फाइल करे जैसे की कभी होस्तिपल में चेक अप या इलाज करवाया हो उसके पेपर |
  2. पत्नी को कही घुमाने ले कर गये हो तो उसके सबूत  भी कोर्ट में पेश करे |
  3. इस केस में सबसे बड़ी लड़ाई पत्नी के मासिक भत्ते की होती है तो पति ये साबित करे की पत्नी खुद कमाती है व अपनी मर्जी से अपने मायके आ-जा सकती है व गयी भी थी|
  4. पत्नी अगर किसी भी घटना का ब्यौरा दे कर आरोप लगाती है तो उस घटना की तारीख महिना व साल जरुर पूछे तथा उसका सबूत भी मांगे क्योकि बिना किसी सबूत के वो आरोप बेकार है हा सिर्फ पत्नी को ताने मारने वाले आरोपो को कोई सबूत की जरूरत नही होती है
  5.  आपकी पत्नी ने आप के खिलाफ ये केस क्यों किया है इसका विवरण कोर्ट को दे कोशिश करे की इसकी जिम्मेदारी अपनी पत्नी पर न डाल कर उसके परिवारवालों पर ही डाले|
  6. पति हो सके तो अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों की गवाही पत्नी के खिलाफ करवाए|
  7. अपने को निर्दोष साबित करने का कार्य पति का ही होता है पर कई चीजो में नही जैसे की मार-पिटाई को पत्नी को मडिकल पेपर या गवाहों के द्वारा ही साबित करना होता है दहेज दिया है या शादी में इतना पैसा खर्च किया तो उसका पैसा कहा से आया  ये भी पत्नी को ही साबित करना है बस इन बातो को ही ध्यान में रख कर पति केस लड़े|
  8. घुमाकर सवाल कैसे पूछे जाते है ये केस पर निर्भर करता है ये सब इतना बड़ा है की लिखा नही जा सकता है और वो ये आपके वकील साहब ज्यादा अच्छी तरह जानते है |इसलिए काबिल वकील साहब को नियुक्त करे |

जमानत Bail :-  

इस केस में पति और उसके परिवार को जमानत लेने की जरूरत नही होती है | कोर्ट में नही जाने पे आप एक्स पार्टी हो जाते है और कोर्ट आपके खिलाफ जजमेंट पास कर देता है | और उस जजमेंट को नहीं मानने पर आपके खिलाफ क़ानूनी कार्यवाही होती है |

पुलिस का रोल :-  

अगर कोर्ट महिला के लिए सुरक्षा (मानसिक व शाररिक ) व ससुराल में ही रहने का आदेश पारित करती है | तो उस आदेश को सही प्रकार से पालन करवाने  की ड्यूटी पुलिस की होती है | जैसे की कोर्ट ने आदेश दे दिया की महिला अपने ससुराल में इन कमरों में रहेंगी तो ऐसे में अगर कोई उस महिला को उस कमरे में जाने से रोकता है तो 100 पर कॉल करने पर पुलिस उस व्यक्ति पर FIR दाखिल करेगी व कोर्ट में महिला उस व्यक्ति पर कोर्ट का आदेश न मानने पर धारा 340 CR.P.C. में भी केस कर सकती है  |

केस कहा फ़ाइल् हो सकता है  :-

ये कोई चलित अपराध की श्रेणी में नही आता है की कही भी शिकायत कही भी हो जाये|  इस की शिकायत सिर्फ वही हो सकती है जहा पर शादी हुई हो या लडकी पहली बार या आखरी बार अपने पति के साथ रही हो | पत्नी अगर A पुलिसे स्टेशन के एरिया में रहती है और उसकी शादी किसी दूसरी जगह जैसे की किसी फार्म हाउस में हुई है और वो  B पुलिस स्टेशन के एरिया में आता है तो लडकी B पुलिसे स्टेशन के एरिया में ही शिकायत करवा सकती है | अगर कही गलत है तो पति हाई कोर्ट में जा कर अपना केस खत्म करवा सकता है |

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोसाई की जजमेंट 09 अप्रैल 2019  के अनुसार अगर पत्नी को ससुराल से निकाला गया है तो वो ससुराल से निकल कर जहा  भी शरण लेती है वहा से केस कर सकती है

क्या केस मजिस्ट्रेट के पास ही खत्म हो सकता है :-

जी हा, ये केस महिला के आवेदन पर किसी भी स्टेज पर उसी महिला कोर्ट में कभी भी समझोते द्वारा खत्म किया जा सकता है

घरेलू हिंसा domestic violence कानुन के अलावा भी है और कानूनों में सजा:-

  • दहेज हत्या करने पर 304 A के तहत आजीवन कारावास
  • महिला की शालीनता भंग करने की मंशा से हिंसा या जबरदस्ती करना. 354 के तहत 1 से 5 साल तक
  • अपहरण, भगाना या महिला को शादी के लिये विवश करना, 366 के तहत 10 साल की सजा ।
  • नाबालिक लडक़ी को कब्जे में रखना , 366 के तहत 10 साल।
  • बलात्कार (सरकारी कर्मचारी द्वारा या सामूहिक बलात्कार अधिक गंभीर माने जाते हैं) 376 के तहत02-10 वर्ष की उम्रकैद।
  • पहली पत्नी के जीवित होते हुए दूसरी शादी करना । 494 के तहत 07 साल की सजा।
  • व्यभिचार. 497 के तहत 5 साल की सजा।
  • महिला की शालीनता को अपमानित करने की मंशा से अपशब्द या अश्लील हरकतें करना 509 के तहत 3 साल की सजा ।

जय हिन्द 

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DHEERAJ KUMAR ADVOCATE

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